Allahabad High Court

NA528/43040/2026 of BABAR ALI Vs STATE OF U.P.AND ANOTHER on 5 October 2026

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JUDICATURE AT ALLAHABAD APPLICATION U/S 528 BNSS No. - 43040 of 2026 Court No. - 73 HON'BLE DR. GAUTAM CHOWDHARY, J. 1. आवेदक के िवद्वान अिधवक्ता और राज्य की ओर से िवद्वान अपर शासकीय

HIGH COURT OF JUDICATURE AT ALLAHABAD

APPLICATION U/S 528 BNSS No. - 43040 of 2026

Court No. - 73

HON'BLE DR. GAUTAM CHOWDHARY, J.

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1. आवेदक के िवद्वान अिधवक्ता और राज्य की ओर से िवद्वान अपर शासकीय अिधवक्ता को सुना गया।

2. आवेदक की ओर से धारा 528 बी.एऩ.एस.एस. के अन्तगर्त यह आवेदन पत्र, मु०अ०सं० 13/2025 में अन्तगर्त धारा 303(2) बी.एन.एस. एवं धारा 3/5 लोक संपित्त क्षित िनवारण अिधिनयम, 1984 एवं धारा 4/21 खान और खिनज (िवकास और िविनयमन) अिधिनयम, 1957 , थाना िचलकाना, िजला सहारनपुर, में प्रेिषत आरोप पत्र िदनांक 24.09.2025 िजसमें चीफ जूडीिसयल मिजस्ट्रेट, सहारनपुर द्वारा प्रेिषत आरोपपत्र िदनांिकत 24.09.2025 की सम्पूणर् कायर्वाही को अपास्त करने हेतु योिजत िकया गया है।

3. आवेदक के िवद्वान अिधवक्ता द्वारा यह तकर् िदया गया है िक एक प्रथम सूचना िरपोटर् (FIR) धारा 303(2) बी.एन.एस., 4/21 खान एवं खिनज (िवकास का िविनयमन) अिधिनयम, 3/5 सावर्जिनक संपित्त नुकसान िनवारण अिध. 1984। उिचत िववेचना के पश्चात, िववेचना अिधकारी ने िदनांक 24.07.2025 को आवेदक के िवरुद्ध अन्तगर्त धारा 303(2) बी.एन.एस. एवं धारा 3/5 लोक संपित्त क्षित िनवारण अिधिनयम, 1984 एवं धारा 4/21 खान और खिनज (िवकास और िविनयमन) अिधिनयम, 1957, के तहत आरोप-पत्र प्रस्तुत िकया और िवद्वान मिजस्ट्रेट ने आदेश िदनांक 24.09.2025 द्वारा उक्त धाराओं के अंतगर्त संज्ञान ले िलया। आगे यह तकर् िदया गया है िक यद्यिप अिधिनयम, 1957 की धारा 22 के अनुसार, न्यायालय अिधिनयम, 1957 के तहत दंडनीय िकसी भी अपराध का संज्ञान तब तक नहीं ले सकता जब तक िक अिधकृत व्यिक्त द्वारा िलिखत में िशकायत (पिरवाद) न की गई हो। यह भी तकर् िदया गया है िक पुिलस द्वारा प्रस्तुत आरोप-पत्र के आधार पर संज्ञान तब तक नहीं िलया जा सकता जब तक िक अिधकृत व्यिक्त द्वारा िशकायत दजर् न की गई हो, और अिधक से अिधक दंड प्रिक्रया संिहता (Cr.P.C.) की धारा 2(d) के अनुसार, यिद अिधकृत व्यिक्त द्वारा Versus Counsel for Applicant(s) : Anil Kumar Shukla Counsel for Opposite Party(s) : G.A. Babar Ali .....Applicant(s) State Of U.P.And Another .....Opposite Party(s)

पुिलस िरपोटर् प्रस्तुत की जाती है, तो उसे िशकायत माना जा सकता है। अपने तकर् के समथर्न में, आवेदक के िवद्वान अिधवक्ता ने इस न्यायालय और माननीय सवोर्च्च न्यायालय के िनणर्यों पर भरोसा िकया है, िजनमें यह िवचार व्यक्त िकया गया है िक पुिलस िरपोटर् (आरोप-पत्र) के आधार पर संज्ञान लेना अिधिनयम, 1957 की धारा 22 द्वारा विजत है, और अिधिनयम, 1957 के तहत कायर्वाही शुरू करने के िलए संबंिधत अिधकारी द्वारा िशकायत के साथ आरोप-पत्र या पुिलस िरपोटर् दािखल की जा सकती है। अिग्रम आवेदकगण के िवद्वान अिधवक्ता द्वारा कथन िकया गया िक आवेदक प्रश्नगत गािड़यों के ड्राईवर मात्र हैं तथा उनके द्वारा उक्त आरोिपत धाराओं का अपराध कािरत नहीं िकया गया है।

4. इसके िवपरीत, िवद्वान अपर शासकीय अिधवक्ता (ए.जी.ए.) ने प्राथर्ना का पुरजोर िवरोध िकया और तकर् प्रस्तुत िकया िक िदनांक 24.09.2025 के आक्षेिपत आदेश में जहाँ तक यह अअन्तगर्त धारा 303(2) बी.एन.एस. एवं धारा 3/5 लोक संपित्त क्षित िनवारण अिधिनयम, 1984 एवं धारा 4/21 खान और खिनज (िवकास और िविनयमन) अिधिनयम, 1957 से संबंिधत है, कोई अवैधता नहीं है। हालाँिक, वे अिधिनयम, 1957 और िनयमावली, 1963 में िनिहत प्रावधानों पर िववाद नहीं कर सके।

5. मैंने पक्षों के परस्पर िवरोधी तकोर्ं को सुना है और अिभलेख का अवलोकन िकया है।

6. संदभर् के िलए अिधिनयम, 1957 की धारा 22 और उत्तर प्रदेश उप-खिनज (िरयायत) िनयमावली, 1963 (इसके बाद 'िनयमावली, 1963') के िनयम 76 को नीचे उद्धृत िकया जा रहा है:- "22. अपराधों का संज्ञान: कोई भी न्यायालय इस अिधिनयम या इसके तहत बनाए गए िकसी भी िनयम के अधीन दंडनीय िकसी भी अपराध का संज्ञान तब तक नहीं लेगा, जब तक िक केंद्र सरकार या राज्य सरकार द्वारा इस संबंध में अिधकृत व्यिक्त द्वारा िलिखत में िशकायत न की गई हो।

76. अपराधों का संज्ञान: (1) कोई भी न्यायालय इन िनयमों के तहत दंडनीय िकसी भी अपराध का संज्ञान तब तक नहीं लेगा, जब तक िक िजला अिधकारी या उनके द्वारा इस संबंध में अिधकृत िकसी अिधकारी द्वारा ऐसे अपराध का गठन करने वाले तथ्यों की िलिखत िशकायत न की गई हो।

(2) प्रथम श्रेणी मिजस्ट्रेट के न्यायालय से अवर (नीचे का) कोई भी न्यायालय इन िनयमों के तहत िकसी भी अपराध का िवचारण नहीं करेगा।"

7. अिधिनयम, 1957 की पूवोर्क्त धारा 22 अत्यंत स्पष्ट है जो यह प्रावधान करती है िक कोई भी न्यायालय अिधिनयम, 1957 के तहत िकसी भी अपराध का संज्ञान नहीं लेगा, और िनयमावली, 1963 का िनयम 76 भी यह प्रावधान करता है िक कोई भी न्यायालय िनयमावली, 1963 के तहत िकसी भी अपराध का संज्ञान तब तक नहीं लेगा जब तक िक केंद्र सरकार या राज्य सरकार द्वारा अिधकृत अिधकारी द्वारा िलिखत में िशकायत दजर् न की गई हो।

8. कंवर पाल िसह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य, (2020) 14 SCC 331 में िरपोटर् िकए गए मामले में, माननीय शीषर् अदालत ने यह व्यवस्था दी िक मिजस्ट्रेट आरोप-पत्र के आधार पर केवल भारतीय दंड संिहता (IPC) के तहत अपराधों के िलए संज्ञान ले सकते हैं, लेिकन अिधिनयम, 1957 के तहत अपराध का संज्ञान केवल अिधिनयम, 1957 के प्रावधानों के अनुसार अिधकृत अिधकारी द्वारा दायर िशकायत के आधार पर ही िलया जा सकता है। इस िनणर्य के पैराग्राफ 12 को िनम्नानुसार उद्धृत िकया जा रहा है:- "12. पूवोर्क्त चचार् के आलोक में, हम िवद्वान मिजस्ट्रेट द्वारा धारा 379 और लोक संपित्त क्षित िनवारण अिधिनयम की धारा 3 और 4 के तहत िलए गए संज्ञान और अिभयोजन को रद्द करने से इनकार करने वाले उच्च न्यायालय के आदेश को सही ठहराते हैं। हालाँिक, हम यह स्पष्ट करना चाहेंगे िक MMDR अिधिनयम, 1957 की धारा 4 के साथ पिठत धारा 21 के तहत अिभयोजन और संज्ञान प्रािधकरण (अिधकृित) के अभाव में वैध और न्यायसंगत नहीं होगा। इसके अलावा, हमारे द्वारा िविधक मुद्दे को तय करने और उसका उत्तर देने में की गई िटप्पिणयों को िशकायत में लगाए गए तथ्यात्मक आरोपों पर िनष्कषर् नहीं माना जाना चािहए। िवचारण न्यायालय स्वतंत्र रूप से तथ्यात्मक आरोपों पर अपना िदमाग लगाएगा और कानून के अनुसार आरोप तय करेगा। उपयुर्क्त िटप्पिणयों के प्रकाश में, अपील को आंिशक रूप से स्वीकार िकया जाता है, क्योंिक हमने IPC की धारा 379 और लोक संपित्त क्षित िनवारण अिधिनयम की धारा 3 और 4 के तहत अपराध के अिभयोजन और संज्ञान को बरकरार रखा है। लागत के संबंध में कोई आदेश नहीं होगा।"

9. सवोर्च्च न्यायालय ने पुनः जयंत एवं अन्य बनाम मध्य प्रदेश राज्य, (2021) 2 SCC 670 के िनणर्य में यह व्यवस्था दी िक यिद पुिलस द्वारा िववेचना के पश्चात आरोप-पत्र दािखल िकया जाता है, तो िवद्वान मिजस्ट्रेट भारतीय दंड संिहता के तहत अपराध के िलए संज्ञान ले सकते हैं, लेिकन अिधिनयम, 1957 के तहत अपराध के िलए िवद्वान मिजस्ट्रेट उस आरोप-पत्र के आधार पर संज्ञान नहीं ले सकते। और यह आगे देखा गया िक मिजस्ट्रेट संज्ञान केवल तभी ले सकते हैं जब अिधिनयम, 1957 के तहत अपराध के िलए उस आरोप-पत्र के साथ अिधकृत अिधकारी द्वारा िशकायत दजर् की गई हो। उपरोक्त िनणर्य के पैराग्राफ 13.3, 13.4 और 13.5 को नीचे उद्धृत िकया जा रहा है:-

"13.3. IPC के तहत अपराध कािरत होने पर, पुिलस िरपोटर् प्राप्त होने पर, क्षेत्रािधकार रखने वाले मिजस्ट्रेट MMDR अिधिनयम और उसके तहत बनाए गए िनयमों के िविभन्न प्रावधानों के उल्लंघन के संबंध में संज्ञान लेने के िलए अिधकृत अिधकारी द्वारा दायर की जाने वाली िशकायत की प्रािप्त की प्रतीक्षा िकए िबना उक्त अपराध का संज्ञान ले सकते हैं।

13.4. यह िक MMDR अिधिनयम और उसके तहत बनाए गए िनयमों के िविभन्न प्रावधानों के उल्लंघन के संबंध में, जब कोई मिजस्ट्रेट संिहता की धारा 156(3) के तहत आदेश पािरत करता है और संबंिधत थाना प्रभारी/SHO को अिधिनयम और िनयमों के िविभन्न प्रावधानों के उल्लंघन के संबंध में अपराध मामला/FIR दजर् करने का िनदेर्श देता है और तत्पश्चात िववेचना के बाद थाना प्रभारी/िववेचना अिधकारी एक िरपोटर् प्रस्तुत करता है, तो उसे संबंिधत मिजस्ट्रेट के साथ-साथ MMDR अिधिनयम की धारा 22 में उिल्लिखत संबंिधत अिधकृत अिधकारी को भेजा जा सकता है और उसके बाद संबंिधत अिधकृत अिधकारी िववेचना अिधकारी द्वारा प्रस्तुत िरपोटर् के साथ िवद्वान मिजस्ट्रेट के समक्ष िशकायत दजर् कर सकता है और उसके बाद िवद्वान मिजस्ट्रेट के िलए िनयत प्रिक्रया का पालन करने के बाद संज्ञान लेना, MMDR अिधिनयम और उसके तहत बनाए गए िनयमों के िविभन्न प्रावधानों के उल्लंघन के संबंध में प्रिक्रया/समन जारी करना खुला होगा और उस चरण में यह कहा जा सकता है िक िवद्वान मिजस्ट्रेट द्वारा संज्ञान िलया गया है।

13.5. ऐसे मामले में जहाँ उल्लंघनकतार् को MMDR अिधिनयम की धारा 23-A की उप-धारा (1) के अनुसार शमन शुल्क (पेनल्टी) के भुगतान पर अपराधों का शमन (कंपाउंड) करने की अनुमित दी जाती है, धारा 23-A की उप- धारा (2) पर िवचार करते हुए, इस प्रकार शमन िकए गए MMDR अिधिनयम या उसके तहत बनाए गए िकन्हीं िनयमों के तहत दंडनीय अपराधों के संबंध में अपराधी के िवरुद्ध कोई कायर्वाही या आगे की कायर्वाही नहीं होगी। हालाँिक, धारा 23-A की उप-धारा (2) के तहत रोक IPC के तहत अपराधों, जैसे िक धारा 379 और 414 IPC के िलए िकसी भी कायर्वाही को प्रभािवत नहीं करेगी और उसे आगे बढ़ाया जाएगा।"

10. उपरोक्त िविधक िस्थित को देखते हुए, यह स्पष्ट है िक अिधिनयम, 1957 या िनयमावली, 1963 के तहत अपराध के िलए संबंिधत न्यायालय केवल अिधकृत अिधकारी द्वारा दायर िशकायत के आधार पर ही संज्ञान ले सकता है, लेिकन वतर्मान मामले में, िवद्वान मिजस्ट्रेट ने

पुिलस द्वारा अन्तगर्त धारा 303(2) बी.एन.एस. एवं धारा 3/5 लोक संपित्त क्षित िनवारण अिधिनयम, 1984 एवं धारा 4/21 खान और खिनज (िवकास और िविनयमन) अिधिनयम, 1957 के तहत दािखल आरोप-पत्र पर संज्ञान िलया है।

11. अतः पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्यों तथा वाद के तथ्यों एवं पिरिस्थितयों के अनुसार पूवोर्क्त संज्ञान आदेश अिधिनयम, 1957 की धारा 22 और िनयमावली, 1963 द्वारा विजत है, इसिलए, केवल अिधिनयम, 1957 की धारा 4/21 और िनयमावली, 1963 के िनयम के तहत अपराधों की सीमा तक इसे अिभखिण्डत िकए जाने योग्य है।

12. तद्नुसार, उपयुर्क्त िटप्पणी के साथ, वतर्मान आवेदन पत्र आंिशक रूप से स्वीकार िकया जाता है तथा मात्र खान और खिनज (िवकास और िविनयमन) अिधिनयम, 1957 की धारा 4/21 और खान एवं खिनज (िवकास एवं िनवारण अिधिनयम), 1963 के िनयम के तहत अपराधों के िलए कायर्वाही को अिभखिण्डत िकया जाता है। हालाँिक, यिद अिधकृत अिधकारी िववेचनािधकारी द्वारा प्रस्तुत पुिलस िरपोटर् के साथ िशकायत दजर् करता है, तो संबंिधत प्रािधकारी िविधक कायर्वाही हेतु स्वतंत्र हैं।

13. यह भी स्पष्ट िकया जाता है िक आवेदक के िवरुद्ध अंतगर्त धारा 303(2) एवं धारा 3/5 सावर्जिनक संपित्त नुकसान िनवारण अिधिनयम की कायर्वाही आगे भी जारी रहेगी। October 6, 2026 S.Mishra

(Dr. Gautam Chowdhary,J.) Digitally signed by :- SHASHI MISHRA High Court of Judicature at Allahabad

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