Allahabad High Court
NA528/45074/2025 of KAMLESH KUMAR SAHU Vs STATE OF U.P. AND ANOTHER on 5 October 2026
JUDICATURE AT ALLAHABAD APPLICATION U/S 528 BNSS No. - 45074 of 2025 Court No. - 73 HON'BLE DR. GAUTAM CHOWDHARY, J. 1. आवेदक के िवद्वान अिधवक्ता और राज्य की ओर से िवद्वान अपर शासकीय
HIGH COURT OF JUDICATURE AT ALLAHABAD
APPLICATION U/S 528 BNSS No. - 45074 of 2025
Court No. - 73
HON'BLE DR. GAUTAM CHOWDHARY, J.
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1. आवेदक के विद्वान अधिवक्ता और राज्य की ओर से विद्वान अपर शासकीय अधिवक्ता को सुना एवं पत्रावली का परिशीलन किया।
2. आवेदक की ओर से धारा 528 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अंतर्गत प्रस्तुत यह आवेदन पत्र, मु०अ०सं० 83/2023, अन्तर्गत धारा 431, 432 भा०दं०वि० व धारा 4/21 खान एवं खनिज (विकास का विनियमन) अधिनियम 1957 एवं धारा 3(1), 58, 72(1) उ०प्र० उपखनिज ( परिहान) नियमावली 2021 तथा धारा 2/3 सार्वजनिक संपत्ति नुकसान निवारण अधिनियम, थाना कुरारा, जिला हमीरपुर में प्रेषित आरोप पत्र, दिनांकित 13.01.2024 से उद्भूत दाण्डिक वाद सं० 2270/2024 (State Vs. Kamlesh Kumar Sahu), जो मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट झांसी के न्यायालय में लंबित है, में पारित प्रसंज्ञान/तलबी आदेश दिनांक 17.09.2024 एवं इस वाद की संपूर्ण कार्यवाही को अपास्त करने हेतु योजित किया गया है।
3. आवेदक के विद्वान अधिवक्ता द्वारा यह तर्क दिया गया है कि आक्षेपित आरोप-पत्र दाखिल किए जाने के अनुसरण में, विद्वान मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने अपने विवेक का बिना कोई प्रयोग किए, दिनांक 17.09.2024 के आदेश के माध्यम से आरोप-पत्र पर प्रसंज्ञान लेते हुए आवेदक के विरुद्ध उपरोक्त धाराओं के अंतर्गत अपराधों के लिए समन जारी कर दिया, जबकि यहां प्रासंगिक है कि इस मामलें में एम.एम.आर.डी. अधिनियम की धारा 22 के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया है तथा प्राधिकृत अधिकारी की शिकायत के अभाव में, विद्वान मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा पारित आदेश दिनांक 17.11.2022 अवैध है और कानून की दृष्टि में पोषणीय नहीं है। आगे यह तर्क दिया गया है कि यद्यपि उ०प्र० खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम की धारा 22 के अनुसार, न्यायालय अधिनियम, 1957 के तहत दंडनीय किसी भी अपराध का संज्ञान तब तक नहीं ले सकता, जब तक कि अधिकृत व्यक्ति द्वारा लिखित में शिकायत (परिवाद) न की गई हो। यह भी तर्क दिया गया है कि पुलिस द्वारा प्रस्तुत आरोप-पत्र के आधार पर संज्ञान तब तक नहीं लिया जा सकता, जब तक कि अधिकृत व्यक्ति द्वारा शिकायत दर्ज न की गई हो और अधिक Versus Counsel for Applicant(s) : Niraj Tiwari, Rohit Tiwari Counsel for Opposite Party(s) : G.A. Kamlesh Kumar Sahu .....Applicant(s) State of U.P. and Another .....Opposite Party(s)
से अधिक दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 2(d) के अनुसार, यदि अधिकृत व्यक्ति द्वारा पुलिस रिपोर्ट प्रस्तुत की जाती है, तो उसे शिकायत माना जा सकता है। अपने तर्क के समर्थन में, आवेदक के विद्वान अधिवक्ता ने इस न्यायालय और माननीय उच्चतम न्यायालय के निर्णयों पर भरोसा किया है, जिनमें यह विचार व्यक्त किया गया है कि पुलिस रिपोर्ट (आरोप-पत्र) के आधार पर संज्ञान लेना उ०प्र० खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम की धारा 22 के द्वारा वर्जित है।
4. इसके विपरीत, विद्वान अपर शासकीय अधिवक्ता ने प्रार्थना का पुरजोर विरोध किया और प्रस्तुत किया कि प्रश्नगत आक्षेपित आदेश में कोई अवैधता नहीं है। हालाँकि, उनके द्वारा उ०प्र० खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम की धारा 22 में निहित प्रावधानों का खण्डन नहीं किया जा सका।
5. उभय पक्षों के तर्कोंं को सुना है और अभिलेख का अवलोकन किया है, जिसके परिलक्षित है कि आवेदकगण के विद्वान अधिवक्ता द्वारा मुख्य रूप से यह विधिक तर्क प्रस्तुत किया गया है कि अधिनियम, 1957 की धारा 22 के वैधानिक प्रावधानों के अनुसार, न्यायालय इस अधिनियम या इसके नियमों के तहत दंडनीय किसी भी अपराध का संज्ञान तब तक नहीं ले सकता, जब तक कि केंद्र सरकार, राज्य सरकार या किसी अधिसूचित अधिकृत व्यक्ति द्वारा लिखित में शिकायत (Complaint/परिवाद) दाखिल न की गई हो। संदर्भ के लिए उ०प्र० खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 की धारा 22 को नीचे उद्धृत किया जा रहा है:- "22. कोई भी न्यायालय इस अधिनियम या इसके तहत बनाए गए किसी भी नियम के तहत दंडनीय किसी भी अपराध का संज्ञान तब तक नहीं लेगा, जब तक कि केंद्र सरकार या राज्य सरकार या इस संबंध में अधिकृत किसी व्यक्ति द्वारा लिखित में शिकायत (Complaint) न की गई हो।"
6. उ०प्र० खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 की पूर्वोक्त धारा 22 अत्यंत स्पष्ट है जो यह प्रावधान करती है कि कोई भी न्यायालय उपरोक्त अधिनियम के तहत किसी भी अपराध का संज्ञान नहीं लेगा, जब तक कि केंद्र सरकार या राज्य सरकार द्वारा अधिकृत अधिकारी द्वारा लिखित में शिकायत दर्ज न की गई हो।
7. कंवर पाल सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य, (2020) 14 SCC 331 में रिपोर्ट किए गए मामले में, माननीय शीर्ष अदालत ने यह व्यवस्था दी कि मजिस्ट्रेट आरोप-पत्र के आधार पर केवल भारतीय दंड संहिता के तहत अपराधों के लिए संज्ञान ले सकते हैं, लेकिन अधिनियम, 1957 के तहत अपराध का संज्ञान केवल अधिनियम, 1957 के प्रावधानों के अनुसार अधिकृत अधिकारी द्वारा दायर शिकायत के आधार पर ही लिया जा सकता है।
8. सर्वोच्च न्यायालय ने पुनः जयंत एवं अन्य बनाम मध्य प्रदेश राज्य, (2021) 2 SCC 670 के निर्णय में यह व्यवस्था दी कि यदि पुलिस द्वारा विवेचना के पश्चात आरोप-पत्र दाखिल किया जाता
है, तो विद्वान मजिस्ट्रेट भारतीय दंड संहिता के तहत अपराध के लिए संज्ञान ले सकते हैं, लेकिन अधिनियम, 1957 के तहत अपराध के लिए विद्वान मजिस्ट्रेट उस आरोप-पत्र के आधार पर संज्ञान नहीं ले सकते। और यह आगे देखा गया कि मजिस्ट्रेट संज्ञान केवल तभी ले सकते हैं जब अधिनियम, 1957 के तहत अपराध के लिए उस आरोप-पत्र के साथ अधिकृत अधिकारी द्वारा शिकायत दर्ज की गई हो। उपरोक्त निर्णय के पैराग्राफ 21.3और 21.5 को नीचे उद्धृत किया जा रहा है:- "21.3. भारतीय दंड संहिता के तहत अपराध कारित होने पर, पुलिस रिपोर्ट प्राप्त होने पर, क्षेत्राधिकार रखने वाले मजिस्ट्रेट खान एवं खनिज (विकास का विनियमन) अधिनियम और उसके तहत बनाए गए नियमों के विभिन्न प्रावधानों के उल्लंघन के संबंध में संज्ञान लेने के लिए अधिकृत अधिकारी द्वारा दायर की जाने वाली शिकायत की प्राप्ति की प्रतीक्षा किए बिना उक्त अपराध का संज्ञान ले सकते हैं।
21.4. यह कि खान एवं खनिज (विकास का विनियमन) अधिनियम और उसके तहत बनाए गए नियमों के विभिन्न प्रावधानों के उल्लंघन के संबंध में, जब कोई मजिस्ट्रेट संहिता की धारा 156(3) के तहत आदेश पारित करता है और संबंधित थाना प्रभारी/ स्टेशन हाऊस ऑफिसर को अधिनियम और नियमों के विभिन्न प्रावधानों के उल्लंघन के संबंध में अपराध मामला/अभियोग दर्ज करने का निर्देश देता है और तत्पश्चात विवेचना के बाद थाना प्रभारी/विवेचना अधिकारी एक रिपोर्ट प्रस्तुत करता है, तो उसे संबंधित मजिस्ट्रेट के साथ-साथ खान एवं खनिज (विकास का विनियमन) अधिनियम की धारा 22 में उल्लिखित संबंधित अधिकृत अधिकारी को भेजा जा सकता है और उसके बाद संबंधित अधिकृत अधिकारी विवेचना अधिकारी द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट के साथ विद्वान मजिस्ट्रेट के समक्ष शिकायत दर्ज कर सकता है और उसके बाद विद्वान मजिस्ट्रेट के लिए नियत प्रक्रिया का पालन करने के बाद संज्ञान लेना, खान एवं खनिज (विकास का विनियमन) अधिनियम और उसके तहत बनाए गए नियमों के विभिन्न प्रावधानों के उल्लंघन के संबंध में प्रक्रिया/समन जारी करना खुला होगा और उस चरण में यह कहा जा सकता है कि विद्वान मजिस्ट्रेट द्वारा संज्ञान लिया गया है।
9. उपरोक्त विधिक स्थिति को देखते हुए, यह स्पष्ट है कि खान एवं खनिज (विकास का विनियमन ) अधिनियम, 1957 की धारा 21(4) का संबंध है, कानून की स्थिति अत्यंत स्पष्ट और सुस्थापित है। बिना किसी सक्षम या अधिकृत अधिकारी की लिखित वैधानिक शिकायत के, पुलिस द्वारा दाखिल सामान्य आरोप-पत्र के आधार पर मजिस्ट्रेट सीधे इस विशेष अधिनियम के तहत अपराध का संज्ञान नहीं ले सकते। वर्तमान मामले में विद्वान मजिस्ट्रेट ने यह सुनिश्चित किए बिना कि क्या रिकॉर्ड पर धारा 22 के अनुकूल वैध लिखित शिकायत मौजूद थी, सीधे पुलिस के आरोप-पत्र पर ही खान एवं खनिज (विकास का विनियमन) अधिनियम, 1957 की धारा 4/21 के तहत संज्ञान ले
लिया, जो विधिक सिद्धांतों के विपरीत होने के कारण निरस्त किए जाने योग्य है।
10. परिणामतः, उपरोक्त तथ्यों और स्थापित नजीरों के आलोक में, यह याचिका आंशिक रूप से स्वीकार की जाती है तथा विद्वान मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, झांसी द्वारा पारित आक्षेपित आदेश दिनांकित 17.09.2024 का वह अंश, जिसके द्वारा खान एवं खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 की धारा 21(4) के अंतर्गत अपराध पर प्रसंज्ञान लिया गया है, को अपास्त (Quash) किया जाता है।
11. हालांकि, आक्षेपित प्रसंज्ञान आदेश दिनांकित 17.09.2024 एवं वाद की शेष कार्यवाही धारा 431, 432 भा०दं०वि० एवं धारा 3(1), 58, 72(1) उ०प्र० उपखनिज (परिहान) नियमावली 2021 तथा धारा 2/3 सार्वजनिक संपत्ति नुकसान निवारण अधिनियम के संदर्भ में विधि अनुसार जारी रहेगी।
12. यह भी स्पष्ट किया जाता है कि राज्य सरकार या संबंधित अधिकृत प्राधिकारी, यदि आवश्यक समझे, तो अधिनियम, 1957 की धारा 22 के तहत निर्धारित विधिक प्रक्रिया का पालन करते हुए आवेदकों के विरुद्ध सक्षम न्यायालय के समक्ष नए सिरे से लिखित शिकायत (परिवाद) दर्ज कराने के लिए स्वतंत्र है। October 6, 2026 CP.sahani
(Dr. Gautam Chowdhary,J.) Digitally signed by :- CHANDRA PRAKASH SAHANI High Court of Judicature at Allahabad