Allahabad High Court

WRIC/38565/2026 of SMT. JAGDAMBA @ SANVI AND ANOTHER Vs STATE OF U.P. AND 5 OTHERS on 23 September 2026

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JUDICATURE AT ALLAHABAD WRIT - C No. - 38565 of 2026 Court No. - 75 HON'BLE DR. GAUTAM CHOWDHARY, J. 1- याचीगण के िवद्वान अिधवक्ता एवं िवद्वान स्थायी अिधवक्ता को सुना एवं

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HIGH COURT OF JUDICATURE AT ALLAHABAD WRIT - C No. - 38565 of 2026 Court No. - 75 HON'BLE DR. GAUTAM CHOWDHARY, J. 1- याचीगण के विद्वान अधिवक्ता एवं विद्वान स्थायी अधिवक्ता को सुना एवं पत्रावली का परिशीलन किया। 2- याचीगण की ओर से इस याचिका के माध्यम से, याचीगण एक परमादेश रिट जारी करने की मांग कर रहे हैं, जिसमें प्रत्युत्तरदातागण को पति और पत्नी के रूप में याचिकाकर्ताओं के शांतिपूर्ण वैवाहिक जीवन में हस्तक्षेप न करने का निर्देश दिया जाए एवं संबंधित अधिकारियों को यह निर्देश देने की मांग की गयी है कि वे याचीगण को सुरक्षा प्रदान करें। 3- याचीगण के विद्वान अधिवक्ता ने तर्क प्रस्तुत किया कि याचीगण वयस्क है और उन्होंने अपनी मर्जी एवं सहमति से बिना किसी दबाव के एक-दूसरे के साथ विवाह कर लिया है एवं दोनों पति- पत्नी के रूप में दांपत्य जीवन व्यतीत कर रह रहे हैं, याचीगण ने अपने उम्र के समर्थन में अपने- अपने हाईस्कूल प्रमाण पत्र की प्रतिलिपि, याचिका के साथ संलग्न किया है, जिनके अवलोकन से यह स्पष्ट है कि दोनों याचीगण बालिग है, याचिका में दिए गए कथन याचीगण के संयुक्त हलफनामों द्वारा समर्थित हैं। याचीगण ने अपने विवाह के पंजीकरण के लिए सक्षम प्राधिकारण के समक्ष आवेदन नहीं किया है, किंतु आवेदन करने वचन देते है। इसके अलावा यह भी अनुरोध किया गया है कि निजी प्रत्युत्तरदाता और परिवार के अन्य सदस्य याचीगण द्वारा किए गए इस विवाह से नाराज हो गए हैं और उनके द्वारा याचीगण को धमकी दी जा रही है और उन्हें परेशान किया जा रहा है, उन्हें आशंका है कि निजी प्रतिवादी अपने परिवार के सम्मान के लिए उन्हें गंभीर उपहित अथवा खत्म कर सकती है। यदि यह न्यायालय उन्हें सुरक्षा प्रदान नहीं करता है, तो उनका जीवन खतरे में पड़ सकता है। 4- विद्वान सी.एस.सी. द्वारा उपर्युक्त तथ्यों से सहमत है। 5- प्रस्तावित आदेश पारित किये जाने के दृष्टिगत, निजी प्रतिवादी को नोटिस जारी करने की कोई आवश्यकता नहीं है, पक्षकारों की ओर से उपस्थित विद्वान अधिवक्ताओं की सहमति से इस रिट याचिका को न्यायालय के नियमों के अनुसार इस स्तर पर अंतिम रूप से निस्तारण किया जा रहा है। 6- माननीय उच्चतम न्यायालय ने कई निर्णयों में यह कानून तय किया है कि जहाँ एक लड़का और लड़की बालिग है और वे अपनी स्वतंत्र इच्छा से एक साथ रह रहे हैं तो उनके माता पिता सहित किसी को भी उनके साथ रहने में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है। यहां इन मामलों में उच्चमत Versus Counsel for Petitioner(s) : Asha, Babu Lal Ram Counsel for Respondent(s) : C.S.C. Smt. Jagdamba @ Sanvi And Another .....Petitioner(s) State Of U.P. And 5 Others .....Respondent(s)

न्यायालय के फ़ैसले का ज़िक्र प्रासंगिक है- Gian Devi v. The Superintendent, Nari Niketan, Delhi and others, (1976) 3 SCC 234; Lata Singh v. State of U.P. and another, (2006) 5 SCC 475; and Bhagwan Dass v. State (NCT of Delhi), (2011) 6 SCC 396, which have consistently been followed by the Supreme Court and this court, as well as of this Court in Deepika and another v. State of U.P. And others, 2013 (9) ADJ 534. The Supreme Court in Gian Devi (supra) has held as under: "Whatever may be the date of birth of the petitioner, the fact remains that she is at present more than 18 years of age. As the petitioner is sui juris no fetters can be placed upon her choice of the person with whom she is to stay, nor can any restriction be imposed regarding the place where she should stay. The court or the relatives of the petitioner can also not substitute their opinion or preference for that of the petitioner in such a matter." 7- उपरोक्त तथ्यों एवं परिस्थितियों के दृष्टिगत इस न्यायालय का मत है कि याचीगण एक साथ रहने के लिए स्वतंत्र है तथा किसी भी व्यक्ति को उनके शान्तिपूर्ण जीवन-निर्वाह करने में हस्तक्षेप करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। यदि याचीगण के शान्तिपूर्ण जीवन-निर्वाह में कोई व्यवधान उत्पन्न होता है तो याचीगण संबंधित वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक/ पुलिस अधीक्षक (प्रत्युत्तरदाता सं०

2) से इस आदेश की प्रमाणित प्रतिलिपि के साथ संपर्क करेंगे और उक्त प्रत्युत्तरदाता सं० 2 को निर्देशित किया जाता है कि वे याचीगण को तत्काल सुरक्षा प्रदान करेंगे।

8. चूँकि (2006) 2 SCC 578 and (2008) 1 SCC 180 Seema (Smt.) Vs Ashwani Kumar, मामले में माननीय उच्चतम न्यायालय के निर्णय के अनुसार विवाह का पंजीकरण अनिवार्य है, इसलिए याचीगण आज से 02 माह के अन्दर अपने विवाह का पंजीकरण कराने का वचन देते हैं।

9. यदि याचीगण उपरोक्त निर्धारित अवधि के भीतर अपने विवाह का पंजीकरण नहीं करा पाते हैं तो इस आदेश के तहत दी गयी सुरक्षा स्वतः ही समाप्त हो जाएगी। 10- निजी प्रत्युत्तरदाता को यह स्वतंत्रता प्रदान की जाती है कि यदि याचीगण द्वारा अभिलेख पर लाए गए दस्तावेज मनगढ़न्त या फर्जी हैं तो वे इस आदेश को वापस लेने के लिए रिकॉल आवेदन दायर करने के लिए स्वतंत्र होंगे। 11- यह स्पष्ट किया जाता है कि इस न्यायालय ने याचीगण के कथित विवाह पर कोई निर्णय नहीं दिया है और यह आदेश किसी भी तरह से याचीगण के विवाह की वैधता के बारे में कोई राय नहीं व्यक्त करता है। 12- उपरोक्त टिप्पणियों के साथ यह रिट याचिका निस्तारित की जाती है। मूल्य के बारे में कोई आदेश नहीं पारित किया जा रहा है। September 24, 2026 CP.sahani WRIC No. 38565 of 2026 2 (Dr. Gautam Chowdhary,J.) Digitally signed by :- CHANDRA PRAKASH SAHANI High Court of Judicature at Allahabad

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