Chhattisgarh High Court
ACQA/155/2019 of STATE OF CHHATTISGARH Vs PRANJAL GUPTA @ PRINCE on 17 August 2026
2026:CGHC:36808
A . No.-155 of 2019} CGHC010052202019 2026:CGHC:36808-DB अप्रति�वे�द्य छत्ती सगढ़ उच्च न्या�या�लया , ति�ल�सपु�र दो�षमु�ति� अपु ल क्रमु�!क -155 /2019
CGHC010052202019
2026:CGHC:36808-DB
अप्रतिवेद्य
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय
, बिलासपुर
दोषमुक्ति
अपील क्रमांक
/2019
छत्तीसगढ़ राज्य, द्वारा थाना प्रभारी, पुलिस थाना-सीतापुर, जिला-सरगुजा, छत्तीसगढ़
-----अपीलार्थी/राज्य
विरूद्घ
प्रांजल गुप्ता उर्फ प्रिंस पिता-अनिल गुप्ता, उम्र-लगभग 23 वर्ष, निवासी-ग्राम महारानीपुर, पुलिस थाना-सीतापुर, जिला-सरगुजा, छत्तीसगढ़
-----उत्तरवादी/अभियुक्त
अपीलार्थी/राज्य द्वारा
: श्री विनोद टेकाम, शासकीय अधिवक्ता ।
उत्तरवादी/अभियुक्त द्वारा
: सुश्री हमीदा सिद्दीकी, वरिष्ठ अधिवक्ता सहित सुश्री महिमा चन्द्रा, अधिवक्ता ।
युगल पीठः
माननीय न्यायमूर्ति श्री संजय अग्रवाल
, न्यायाधीश
माननीय न्यायमूर्ति श्री संजय कुमार जायसवाल , न्यायाधीश
!! निर्णय पीठ पर पारित !!
18/08/2026
द्वारा
संजय कुमार जायसवाल
, न्यायाधीश
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1. दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 378(1) के अंतर्गत दोषमुक्ति के विरुद्ध प्रस्तुत इस अपील में न्यायालय-अपर सत्र न्यायाधीश, एफफ.टी.सी., जिला-सरगुजा (अम्बि कापुर), छत्तीसगढ़ द्वारा विशेष दाण्डि क प्रकरणण (पॉक्सो) क्रमांक-22/2017, “छत्तीसगढ़ राज्य विरुद्ध प्रांजल गुप्ता उर्फ प्रिंस” में दिनांक 31/08/2018 को पारित निर्णय की वैधता को चुनौती दी गई है, जिसके तहत अभियोजन का मामला संदेह से परे प्रमाणित न पाए जाने पर अभियुक्त को भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा-376(2)(ढ), 313 तथा लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षणण अधिनियम, 2012 की धारा 5(ठ) सहपठित धारा 6 एवं 5(ञ)( ) ii के अपराधों से दोषमुक्त किया गया है । जिसे संक्षेप में “प्रश्नाधीन निर्णय” से संबोधित किया जा रहा है ।
2. अभियोजन का मामला, संक्षेप में, इस प्रकार है कि अभियोक्त्री (अ.सा.-5) का वर्ष 2015 में फोन के माध्यम से अभियुक्त से बातचीत एवं परिचय हुआ । अभियुक्त ने अभियोक्त्री से प्रेम का इजहार करते हुए उससे विवाह करने की बात कही तथा दिनांक 30/07/2015 को रात्रि में उसके घर जाकर उसके साथ शारीरिक संबंध स्थापित किया । इसके पश्चात् अभियुक्त द्वारा विवाह का आश्वासन देते हुए लगातार उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए गए, जिसके परिणामस्वरूप अभियोक्त्री गर्भवती हो गई । अभियुक्त द्वारा उसे दवा खि लाकर उसका गर्भपात कराया गया तथा इसके बाद भी विवाह का आश्वासन देकर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए जाते रहे, किंतु उससे विवाह नहीं किया गया । अभियोक्त्री के माता-पिता को घटना की जानकारी होने पर उनके द्वारा प्रस्तुत लिखि त शिकायत प्रदर्श पी-1 के आधार पर थाना सीतापुर में दिनांक 14/04/2017 को प्रथम सूचना पत्र दर्ज की गई । विवेचना के दौरान अभियोक्त्री का चिकित्सीय परीक्षणण कराया गया, चिकित्सक द्वारा तैयार स्लाईड को रासायनिक परीक्षणण हेतु भेजा गया, उसके जन्म
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संबंधी दस्तावेज जब्त किए गए, घटनास्थल का नक्शा तैयार किया गया तथा साक्षियों के कथन लेखबद्ध किए गए । अभियोक्त्री का कथन धारा 164 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत दर्ज कराया गया । संपूर्ण विवेचना उपरांत अभियुक्त के विरुद्ध अभियोगपत्र प्रस्तुत किया गया ।
3. विचारणण न्यायालय के समक्ष अभियोजन की ओर से अपने पक्ष समर्थन में 11 साक्षियों का परीक्षणण तथा 17 दस्तावेज प्रदर्श चिन्हांकित कराए गए । धारा-313 दण्ड प्रक्रिया संहिता के तहत कथन में अभियुक्त ने अपने विपरीत साक्षियों के कथनों को इनकार करते हुए स्वयं को निर्दोष होना और झूठा फंसा जाना बताया । बचाव में सहायक उप निरीक्षक अनिल पाण्डेय (ब.सा.-1) का परीक्षणण कराया गया । जिसने यह कथन किया कि अभियोक्त्री पूर्व में एक अन्य अवसर पर बिना बताए घर से चली गई थी, जिसके संबंध में थाना सीतापुर में गुम इंसान क्रमांक 32/2016 दर्ज किया गया था तथा तत्पश्चात् अपराध क्रमांक 166/2016 अंतर्गत धारा 363 एवं 366 भारतीय दण्ड संहिता के अंतर्गत अज्ञात आरोपी के विरुद्ध अपराध पंजीबद्ध किया गया था । जिसमें अभियोक्त्री की बरामदगी पर उसने अपने साथ कोई अपराध ना होना बताया था । तत्पश्चात् उभयपक्ष को सुना जाकर विचारणण न्यायालय द्वारा प्रश्नाधीन दोषमुक्ति का निर्णय पारित किया गया है जिसे इस अपील में चुनौती दी गई है ।
4. अपीलार्थी/राज्य की ओर से उपस्थि त विद्वान अधिवक्ता ने तर्क किया है कि अभियोजन द्वारा संदेह से परे यह प्रमाणित किया गया है कि घटना के समय अभियोक्त्री की आयु 18 वर्ष से कम होने के कारणण वह अवयस्क थी । इसके बावजूद, अभियोक्त्री एवं उसके अभिभावक द्वारा अभियोजन के मामले का समर्थन किए जाने के तथ्य को विचारणण
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न्यायालय ने उचित रूप से विचार में नहीं लिया तथा अभियोक्त्री को सहमत पक्ष मानते हुए अभियुक्त को दोषमुक्त कर दिया, जो विधि एवं अभिलेख पर उपलब्ध साक्ष्य के विपरीत है । अभियोजन द्वारा, अभियुक्त के विरुद्ध आरोपित अपराध का मामला प्रमाणित किया गया है । अतः प्रश्नाधीन दोषमुक्ति का निर्णय अपास्त करते हुए अपील स्वीकार की जाए तथा अभियुक्त को दोषसिद्ध कर विधि के अनुसार दण्डि त किया जाए ।
5. इसके विपरीत, उत्तरवादी/अभियुक्त की ओर से उपस्थि त विद्वान अधिवक्ता ने विचारणण न्यायालय के प्रश्नाधीन निर्णय का समर्थन करते हुए तर्क किया है कि अभियोजन यह प्रमाणित करने में असफफल रहा है कि कथित घटना के समय अभियोक्त्री 18 वर्ष से कम आयु की होने के कारणण अवयस्क थी । इस संदर्भ में विद्वान अधिवक्ता द्वारा न्यायदृष्टांत Jarnail Singh v. State of Haryana, (2013) 7 SCC 263 का हवाला दिया गया है । विद्वान अधिवक्ता ने आगे तर्क किया है कि घटना के समय अभियोक्त्री वयस्क तथा सहमत पक्ष थी । ऐसी स्थि ति में अभियुक्त के विरुद्ध आरोप प्रमाणित नहीं होते हैं । अतः विचारणण न्यायालय द्वारा अभियुक्त को दोषमुक्त किए जाने का निष्कर्ष अभिलेख पर उपलब्ध साक्ष्य एवं विधि के अनुरूप है तथा उसमें हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं है । फफलतः अपील खारिज किए जाने का निवेदन किया गया ।
6. उभयपक्ष का तर्क श्रवणण किया गया और विचारणण न्यायालय के अभिलेख का सूक्ष्मतापूर्वक परिशीलन किया गया ।
7. न्यायदृष्टांत Mallappa and other v. State of Karnataka, (2024) 3 SCC 544 में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा दोषमुक्ति के विरूद्घ प्रस्तुत अपील के निराकरणण हेतु कुछ न्यायिक सिद्घांत प्रतिपादित किए गए हैं । जिसमें साक्ष्य के समग्र मूल्यांकन, दो संभावित
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दृष्टिकोणों की स्थि ति में अभियुक्त के पक्ष में दृष्टिकोणण अपनाए जाने तथा विचारणण न्यायालय के निष्कर्ष में अवैधता, विकृति अथवा विधि या तथ्य संबंधी त्रुटि पाए जाने पर ही हस्तक्षेप किए जाने के सिद्धांत प्रतिपादित किए हैं ।
8. संपूर्ण मामले के परिशीलन से यह तथ्य उल्लेखनीय है कि स्वयं अभियोक्त्री (अ.सा.-5) ने अपने न्यायालयीन बयान में अपनी कोई जन्मतिथि नहीं बतायी है । यहां तक कि शिकायतकर्ता के रूप में उसके पिता (अ.सा.-1) ने भी अभियोक्त्री की जन्मतिथि नहीं बतायी है । माता (अ.सा.-4) तथा चाची (अ.सा.-3) ने भी अभियोक्त्री की जन्मतिथि के संबंध में कोई जानकारी नहीं दी है । अभियोक्त्री की जन्मतिथि के संबंध में अभियोजन की ओर से प्रस्तुत एकमात्र, साक्ष्य विवेचक द्वारा अभियोक्त्री के शाला की दाखि ल-खारिज पंजी की जब्ती प्रदर्श पी-11 तथा उसके अंतर्गत प्रदर्श पी-17 के रूप में प्रस्तुत दाखि ल- खारिज अभिलेख है । उक्त अभिलेख अनुसार शिक्षिका ऐगनेस डेविड (अ.सा.-11) ने अपने साक्ष्य में बताया है कि अभियोक्त्री की जन्मतिथि 14/08/2000 दर्ज है । शिकायत के अनुसार कथित घटना वर्ष 2015 से 2017 के मध्य की है । अतः 14/08/ 2000 को जन्मतिथि मानने पर कथित घटना के समय अभियोक्त्री की आयु 15 से 17 वर्ष थी । किंतु मात्र उक्त विद्यालयीन अभिलेख के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि घटना के समय अभियोक्त्री 18 वर्ष से कम आयु की थी, जब तक कि उक्त जन्मतिथि की प्रविष्टि के आधार एवं स्रोत का विश्वसनीय साक्ष्य उपलब्ध न हो ।
9. न्यायदृष्टांत Jarnail Singh (पूर्वोक्त) के मामले में माननीय उच्चतम न्यायालय ने बालक की आयु निर्धारणण के संबंध में मार्गदर्शक सिद्धांत प्रतिपादित किए हैं, जो कण्डि का-22 एवं 22 में निम्नानुसार हैं :-
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“22. On the issue of determination of age of a minor, one only needs to make a reference to Rule 12 of the Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Rules, 2007 (hereinafter referred to as “the 2007 Rules”). The aforestated 2007 Rules have been framed under Section 68(1) of the Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Act, 2000. Rule 12 referred to hereinabove reads as under: “12. Procedure to be followed in determination of age.—
In every case concerning a child or a juvenile in conflict with law, the court or the Board or as the case may be, the Committee referred to in Rule 19 of these Rules shall determine the age of such juvenile or child or a juvenile in conflict with law within a period of thirty days from the date of making of the application for that purpose.
The court or the Board or as the case may be the Committee shall decide the juvenility or otherwise of the juvenile or the child or as the case may be the juvenile in conflict with law, prima facie on the basis of physical appearance or documents, if available, and send him to the observation home or in jail.
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In every case concerning a child or juvenile in conflict with law, the age determination inquiry shall be conducted by the court or the Board or, as the case may be, the Committee by seeking evidence by obtaining—
(a)
(i) the matriculation or equivalent certificates, if available; and in the absence whereof;
(ii) the date of birth certificate from the school (other than a play school) first attended; and in the absence whereof;
(iii) the birth certificate given by a corporation or a municipal authority or a panchayat;
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(b) and only in the absence of either (i), (ii) or
(iii) of clause (a) above, the medical opinion will be sought from a duly constituted Medical Board, which will declare the age of the juvenile or child. In case exact assessment of the age cannot be done, the court or the Board or, as the case may be, the Committee, for the reasons to be recorded by them, may, if considered necessary, give benefit to the child or juvenile by considering his/her age on lower side within the margin of one year, and, while passing orders in such case shall, after taking into consideration such evidence as may be available, or the medical opinion, as the case may be, record a finding in respect of his age and either of the evidence specified in any of the clauses (a)(i),
(ii) , (iii) or in the absence whereof, clause (b) shall be the conclusive proof of the age as regards such child or the juvenile in conflict with law.
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If the age of a juvenile or child or the juvenile in conflict with law is found to be below 18 years on the date of offence, on the basis of any of the conclusive proof specified in sub-rule (3), the court or the Board or as the case may be the Committee shall in writing pass an order stating the age and declaring the status of juvenility or otherwise, for the purpose of the Act and these Rules and a copy of the order shall be given to such juvenile or the person concerned.
Save and except where, further inquiry or otherwise is required, inter alia, in terms of Section 7-A, Section 64 of the Act and these Rules, no further inquiry shall be conducted by the court or the Board after examining and obtaining the certificate or any other documentary proof referred to in sub-rule (3) of this Rule.
The provisions contained in this Rule shall also apply to those disposed of cases, where the status of juvenility has not been determined in accordance
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with the provisions contained in sub-rule (3) and the Act, requiring dispensation of the sentence under the Act for passing appropriate order in the interest of the juvenile in conflict with law.”
23. Even though Rule 12 is strictly applicable only to determine the age of a child in conflict with law, we are of the view that the aforesaid statutory provision should be the basis for determining age, even of a child who is a victim of crime. For, in our view, there is hardly any difference insofar as the issue of minority is concerned, between a child in conflict with law, and a child who is a victim of crime. Therefore, in our considered opinion, it would be just and appropriate to apply Rule 12 of the 2007 Rules, to determine the age of the prosecutrix VW, PW 6. The manner of determining age conclusively has been expressed in sub-rule (3) of Rule 12 extracted above. Under the aforesaid provision, the age of a child is ascertained by adopting the first available basis out of a number of options postulated in Rule 12(3). If, in the scheme of options under Rule 12(3), an option is expressed in a preceding clause, it has overriding effect over an option expressed in a subsequent clause. The highest rated option available would conclusively determine the age of a minor. In the scheme of Rule 12(3), matriculation (or equivalent) certificate of the child concerned is the highest rated option. In case, the said certificate is available, no other evidence can be relied upon. Only in the absence of the said certificate, Rule 12(3) envisages consideration of the date of birth entered in the school first attended by the child. In case such an entry of date of birth is available, the date of birth depicted therein is liable to be treated as final and conclusive, and no other material is to be relied upon. Only in the absence of such entry, Rule 12(3) postulates
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reliance on a birth certificate issued by a corporation or a municipal authority or a panchayat. Yet again, if such a certificate is available, then no other material whatsoever is to be taken into consideration for determining the age of the child concerned, as the said certificate would conclusively determine the age of the child. It is only in the absence of any of the aforesaid, that Rule 12(3) postulates the determination of age of the child concerned, on the basis of medical opinion.”
10. उल्लेखनीय है कि विचाराधीन मामले में न तो अभियोक्त्री का माध्यमिक परीक्षा प्रमाणण-पत्र प्रस्तुत किया गया है, न ही प्रथम कक्षा में प्रवेश से संबंधित कोई प्रमाणण-पत्र और न ही नगर निगम अथवा नगरपालिका द्वारा जारी जन्म प्रमाणण-पत्र प्रस्तुत किया गया है । इसके विपरीत, शिक्षिका ऐगनेस डेविड (अ.सा.-11) ने दाखि ल-खारिज पंजी प्रदर्श पी-17 को प्रमाणित करते हुए अपने साक्ष्य में बताया है कि अभियोक्त्री ने उनके संत जोसेफफ कॉन्वेंट, भैंसाखार, सीतापुर, जिला सरगुजा, छत्तीसगढ़ के विद्यालय में कक्षा दूसरी में प्रवेश लिया था । प्रतिपरीक्षणण में उक्त साक्षी ने स्पष्ट किया है कि दाखि ल-खारिज पंजी में अंकित जन्मतिथि अभियोक्त्री की कक्षा प्रथम की अंकसूची के आधार पर दर्ज की गई थी । इस प्रकार, जन्मतिथि के मूल स्रोत के रूप में कक्षा प्रथम की अंकसूची अथवा उस विद्यालय का अभिलेख प्रासंगिक है, किंतु वह मूल अभिलेख अभियोजन द्वारा प्रस्तुत नहीं किया गया है । यह भी उल्लेखनीय है कि शिक्षिका ऐगनेस डेविड ने अपने साक्ष्य में कहीं यह नहीं बताया है कि दाखि ल-खारिज पंजी में जन्मतिथि की उक्त प्रविष्टि उसके द्वारा स्वयं की गई थी । न ही उसने यह स्पष्ट किया है कि उक्त जन्मतिथि अभियोक्त्री के माता-पिता अथवा किसी अन्य अभिभावक द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर दाखि ल-खारिज पंजी में
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अंकित की गई थी । अतः प्रदर्श पी-17 में अंकित जन्मतिथि के मूल आधार एवं स्रोत के संबंध में आवश्यक एवं विश्वसनीय साक्ष्य का अभाव है ।
11. यह महत्वपूर्ण तथ्य है कि किसी बच्चे की जन्मतिथि के संबंध में उसके माता-पिता अथवा ऐसे व्यक्ति को, जिसे जन्म का प्रत्यक्ष एवं विशेष ज्ञान हो, स्वाभाविक एवं विश्वसनीय जानकारी हो सकती है । स्वयं बच्चे को भी अपनी जन्मतिथि की जानकारी सामान्यतः माता-पिता; पालक या किसी प्रामाणिक दस्तावेज अथवा प्रमाणण-पत्र के माध्यम से होती है । प्रस्तुत मामले में न तो अभियोक्त्री स्वयं अपनी जन्मतिथि बता सकी है और न ही उसके माता-पिता अथवा अन्य अभिभावक उसकी जन्मतिथि के संबंध में कोई स्पष्ट एवं विश्वसनीय जानकारी दे सके हैं । ऐसी स्थि ति में शिक्षिका ऐगनेस डेविड (अ.सा.-11) द्वारा प्रदर्श पी-17 की दाखि ल-खारिज पंजी में अंकित जन्मतिथि किस व्यक्ति द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर दर्ज की गई थी, यह स्पष्ट नहीं होता है । विशेष रूप से तब, जब उक्त साक्षी ने स्वयं यह स्वीकार किया है कि जन्मतिथि कक्षा प्रथम की अंकसूची के आधार पर दर्ज की गई थी, जबकि उक्त मूल अंकसूची अथवा संबंधित विद्यालय का अभिलेख अभियोजन द्वारा प्रस्तुत नहीं किया गया है ।
12. न्यायदृष्टांत Manak Chand alias Mani v. State of Haryana, (2024) 20 SCC 561 में माननीय उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया है कि विद्यालयीन अभिलेख में अंकित जन्मतिथि मात्र के आधार पर आयु सिद्ध नहीं मानी जा सकती । ऐसी प्रविष्टि की साक्ष्यात्मक महत्ता तभी होगी, जब यह प्रमाणित हो कि जन्मतिथि माता-पिता अथवा ऐसे व्यक्ति द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर अंकित की गई थी, जिसे संबंधित व्यक्ति की जन्मतिथि का विशेष ज्ञान था । केवल विद्यालयीन अभिलेख प्रस्तुत कर देने से आयु का
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निर्धारणण नहीं किया जा सकता, विशेषकर तब, जब आयु के संबंध में परस्पर विरोधी साक्ष्य उपलब्ध हों ।
13. न्यायदृष्टांत Alamelu and another v. State represented by Inspector of Police, (2011) 2 SCC 385 में माननीय उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया है कि सरकारी विद्यालय द्वारा जारी एवं प्रधानाध्यापक द्वारा विधिवत हस्ताक्षरित स्थानांतरणण प्रमाणण-पत्र भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 35 के अंतर्गत ग्राह्य हो सकता है, किंतु उसमें अंकित जन्मतिथि की साक्ष्यात्मक महत्ता तब तक पर्याप्त नहीं है, जब तक उस आधारभूत सामग्री का प्रमाणण न हो, जिसके आधार पर जन्मतिथि अंकित की गई थी । जन्मतिथि अंकित करने वाले अथवा जन्मतिथि बताने वाले व्यक्ति का परीक्षणण आवश्यक है ।
14. न्यायदृष्टांत Birad Mal Singhvi v. Anand Purohit, AIR 1988 SC 1796 में माननीय उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया है कि विद्यालयीन रजिस्टर में जन्मतिथि की प्रविष्टि भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 35 के अंतर्गत प्रासंगिक एवं ग्राह्य हो सकती है, किंतु केवल ऐसी प्रविष्टि के आधार पर आयु सिद्ध नहीं मानी जा सकती । यह प्रमाणित किया जाना आवश्यक है कि उक्त प्रविष्टि किस आधार पर की गई थी; अन्यथा ऐसी प्रविष्टि की साक्ष्यात्मक महत्ता अत्यल्प होगी ।
15. न्यायदृष्टांत Babloo Pasi v. State of Jharkhand and another, (2008) 13 SCC 133 में माननीय उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया है कि किसी व्यक्ति की आयु निर्धारित करने के लिए कोई निश्चि त या यांत्रिक सूत्र निर्धारित नहीं किया जा सकता । आयु का निर्धारणण अभिलेख पर उपलब्ध सामग्री तथा प्रस्तुत साक्ष्य के समग्र मूल्यांकन के
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आधार पर किया जाना चाहिए । चिकित्सकीय साक्ष्य आयु निर्धारणण में उपयोगी मार्गदर्शक है, किंतु वह निर्णायक नहीं है । साथ ही, विद्यालयीन रजिस्टर में अंकित जन्मतिथि तभी प्रभावी साक्ष्य हो सकती है, जब उस प्रविष्टि के आधार का प्रमाणण उपलब्ध हो ।
16. न्यायदृष्टांत Sunil v. State of Haryana, (2010) 1 SCC 742 में माननीय उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया है कि केवल अनुमानित अथवा आधारहीन जन्मतिथि के आधार पर किसी अभियुक्त को दोषसिद्ध नहीं किया जा सकता । जब आयु संबंधी कथन किसी अभिलेख अथवा विश्वसनीय साक्ष्य से समर्थित न हो और केवल अनुमान पर आधारित हो, तब ऐसी आयु के आधार पर दोषसिद्धि करना सुरक्षित नहीं है तथा अभियुक्त संदेह के लाभ का अधिकारी है ।
17. अतः उपर्युक्त न्यायदृष्टांतों में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा प्रतिपादित विधि के प्रकाश में, यह न्यायालय पाती है कि केवल प्रदर्श पी-17 में अंकित जन्मतिथि के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना सुरक्षित नहीं है कि कथित घटना के समय अभियोक्त्री 18 वर्ष से कम आयु की थी । फफलतः विचारणण न्यायालय द्वारा अभियोक्त्री को घटना के समय नाबालिग मानते हुए निकाला गया निष्कर्ष, अभिलेख पर उपलब्ध साक्ष्य तथा विधि के अनुरूप नहीं है तथा स्थि र रखे जाने योग्य नहीं है । अतः यह न्यायालय पाती है कि अभियोजन संदेह से परे यह प्रमाणित करने में असफफल रहा है कि कथित घटना के समय अभियोक्त्री 18 वर्ष से कम आयु की नाबालिग थी ।
18. स्वयं पिता (अ.सा.-1) द्वारा प्रस्तुत लिखि त शिकायत प्रदर्श पी-1 के परिशीलन तथा अभियोक्त्री (अ.सा.-5) एवं उसके माता-पिता के न्यायालयीन कथनों से यह परिलक्षित होता है कि अभियोक्त्री एवं अभियुक्त के मध्य संबंध उसकी सहमति से स्थापित हुए थे । अभियोक्त्री ने अपने न्यायालयीन कथन में स्पष्ट रूप से बताया है कि अभियुक्त उसके घर
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आकर उसके साथ शारीरिक संबंध स्थापित करता था तथा उसे अपने घर बुलाकर भी संबंध स्थापित करता था । अभियोक्त्री ने यह भी स्वीकार किया है कि वह गर्भवती हुई थी, किंतु गर्भपात होने तक उसने अपने माता-पिता को अपने गर्भधारणण की जानकारी नहीं दी थी । उसने अभियुक्त द्वारा दी गई दवा का सेवन करने के पश्चात् गर्भपात होने की बात कही है । हालांकि, अभियोक्त्री के गर्भधारणण अथवा गर्भपात के संबंध में कोई चिकित्सीय साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया है । न ही यह प्रमाणित करने के लिए कोई विश्वसनीय साक्ष्य उपलब्ध है कि अभियुक्त द्वारा उसे कौन-सी दवा दी गई थी । उक्त दवा अभियुक्त के कब्जे से जब्त भी नहीं की गई है । विवेचना के दौरान उस दवा के संबंध में कोई प्रभावी विवेचना नहीं की गई । ऐसी स्थि ति में गर्भपात के संबंध में अभियोजन के मामले को समर्थित करने वाला आवश्यक एवं विश्वसनीय साक्ष्य उपलब्ध नहीं है । अतः अभियोक्त्री के संपूर्ण साक्ष्य तथा अभिलेख के समग्र परिशीलन से यह परिलक्षित होता है कि अभियुक्त एवं अभियोक्त्री के मध्य स्थापित संबंध उसकी सहमति से थे ।
19. उपरोक्त विवेचना के आधार पर हम पाते हैं कि अभियोजन यह प्रमाणित करने में असफफल रहा है कि कथित घटना के समय अभियोक्त्री 18 वर्ष से कम आयु की थी । इसके विपरीत, अभिलेख पर उपलब्ध साक्ष्य के समग्र परिशीलन से यह स्थापित हुआ है कि अभियोक्त्री, अभियुक्त के साथ स्थापित संबंधों में सहमत पक्ष थी तथा गर्भपात के संबंध में भी अभियोजन द्वारा पर्याप्त एवं विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया है । ऐसी स्थि ति में, विचारणण न्यायालय द्वारा अभियुक्त को दोषमुक्त किए जाने का निष्कर्ष अभिलेख पर उपलब्ध तथ्य एवं साक्ष्य के विपरीत अथवा प्रतिकूल नहीं है । प्रश्नाधीन दोषमुक्ति के निर्णय में कोई अवैधता अथवा अशुद्धता परिलक्षित नहीं होती । अतः विचारणण न्यायालय द्वारा पारित दोषमुक्ति में हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं है ।
20. अतः दोषमुक्ति के विरूद्घ प्रस्तुत यह अपील स्वीकार योग्य नहीं होने से खारिज की जाती है ।
21. निर्णय की प्रतिलिपि के साथ विचारणण न्यायालय का अभिलेख शीघ्रतापूर्वक वापस प्रेषित हो । सही/- (संजय अग्रवाल) न्यायाधीश सही/- (संजय कुमार जायसवाल) न्यायाधीश पोमन
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