Chhattisgarh High Court

ACQA/376/2018 of STATE OF CHHATTISGARH Vs PYAR MOHAMMEDB @ MAJHILA on 10 August 2026

2026:CGHC:35302

A . No.-376 of 2018} CGHC010298042018 2026:CGHC:35302-DB अप्रति�वे�द्य छत्ती सगढ़ उच्च न्या�या�लया , ति�ल�सपु�र दो�षमु�ति� अपु ल क्रमु�!क -376 /2018 

CGHC010298042018

2026:CGHC:35302-DB

अप्रतिवेद्य

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय

, बिलासपुर

दोषमुक्ति

अपील क्रमांक

/2018

छत्तीसगढ़ राज्य, द्वारा पुलिस थाना-बलरामपुर, जिला-बलरामपुर-रामानुजगंज, छत्तीसगढ़

-----अपीलार्थी/राज्य

विरूद्घ

प्यार मोहम्मद उर्फ मझिला पिता-सीतारूउद्दीन शेख, उम्र-लगभग 36 वर्ष वर्तमान 45

वर्ष, निवासी-ग्राम बड़की, महरी, पुलिस थाना-बलरामपुर, जिला-सरगुजा, वर्तमान जिला-बलरामपुर-रामानुजगंज, छत्तीसगढ़

-----उत्तरवादी/अभियुक्त

अपीलार्थी/राज्य द्वारा

: श्री विनोद टेकाम, शासकीय अधिवक्ता ।

उत्तरवादी/अभियुक्त द्वारा

: श्री विद्या भूषण सोनी, अधिवक्ता ।

युगल पीठः

माननीय न्यायमूर्ति श्री संजय अग्रवाल

, न्यायाधीश

माननीय न्यायमूर्ति श्री संजय कुमार जायसवाल , न्यायाधीश

!! निर्णय पीठ पर पारित !!

11/08/2026

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द्वारा

संजय कुमार जायसवाल

, न्यायाधीश

1. दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा-378 (1) के तहत दोषमुक्ति के विरूद्घ प्रस्तुत इस अपील में विचारण न्यायालय-अपर सत्र न्यायाधीश, रामानुजगंज, जिला-बलरामपुर- रामानुजगंज, छत्तीसगढ़ द्वारा सत्र प्रकरण क्रमांक-01/2010 “छत्तीसगढ़ राज्य विरूद्घ प्यार मोहम्मद उर्फ मझिला” में पारित निर्णय दिनांक-26/04/2018 की वैधता को चुनौती दी गई है, जिसके तहत अभियोजन का मामला प्रमाणित न पाते हुए अभियुक्त को भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 450, 376, 323, 506 (भाग-एक) के अपराधों से संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त किया गया है । जिसे आगे “प्रश्नाधीन निर्णय” से संबोधित किया जा रहा है ।

2. अभियोजन मामला, संक्षेप में, इस प्रकार है कि लगभग 35 वर्षीय पीड़िता (अ.सा.-3) अपने पति एवं बच्चों के साथ ग्राम पीपरसोत में निवासरत थी तथा मजदूरी का कार्य करती थी । वह पागल जैसी हो गई थी और बीमार रहती थी । तब उसके पति द्वारा अभियुक्त से झाड़-फूंक कराया गया, जिससे वह ठीक हो गई । इसके पश्चात् अभियुक्त का उसके घर आना-जाना प्रारंभ हो गया । पीड़िता ने पुलिस थाना बलरामपुर में दिनांक 10/11/ 2009 को इस आशय की शिकायत दर्ज कराई कि लगभग एक वर्ष पूर्व, माह नवंबर में, अभियुक्त उसके घर करीब 10:00 बजे आया था । उस समय उसके पति एवं बच्चे घर पर नहीं थे । अभियुक्त ने उसके साथ जबरन बलात्कार किया तथा किसी को घटना बताने पर जान से मारने की धमकी देकर चला गया । इसके पश्चात् वह उसी दिन से अभियुक्त के यहाँ धान काटने के लिए जाने लगी । वहाँ खेत में भी अभियुक्त ने उसके साथ बलात्कार किया । तीसरे दिन अभियुक्त पुनः उसके घर आया और उसके साथ बलात्कार किया तथा

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धमकी दी कि यदि उसने किसी को घटना बताई तो वह उसे पहले की तरह पागल कर देगा । इसी भय के कारण उसने घटना के संबंध में किसी को जानकारी नहीं दी । दिनांक 03/11/2009 को दिन में करीब 10:00 बजे अभियुक्त पुनः उसके घर आया । उस समय वह घर में अकेली थी । अभियुक्त ने उसके साथ शारीरिक संबंध बनाने का प्रयास किया, जिसका उसने विरोध किया । तब अभियुक्त ने उसका बाल पकड़कर तथा डण्डे से मारपीट किया । इससे परेशान होकर उसने घटना की जानकारी रामपति बाई तथा आभापति को दी और अगले दिन अपनी माँ एवं पति को भी घटना के संबंध में बताया । तत्पश्चात् थाने में शिकायत दर्ज कराई गई, जिस पर प्रदर्श पी-3 के रूप में प्रथम सूचना पत्र दर्ज की गई । विवेचना के दौरान पीड़िता का चिकित्सीय परीक्षण कराया गया, उसका जाति प्रमाण-पत्र जप्त किया गया, घटनास्थल का नक्शा तैयार किया गया तथा साक्षियों के कथन दर्ज किए गए । पीड़िता के अंतरवस्त्र जप्त कर उन्हें रासायनिक परीक्षण हेतु प्रेषित किया गया । संपूर्ण विवेचना उपरांत अभियुक्त के विरुद्ध अभियोगपत्र प्रस्तुत किया गया ।

3. विचारण न्यायालय के समक्ष अभियोजन की ओर से अपने पक्ष समर्थन में 08 साक्षियों का परीक्षण तथा 18 दस्तावेज प्रदर्श चिन्हांकित कराए गए । धारा-313 दण्ड प्रक्रिया संहिता के तहत कथन में अभियुक्त ने अपने विपरीत साक्षियों के कथनों को इनकार करते हुए स्वयं को निर्दोष होना बताया हैं जिसकी ओर से बचाव में फागूराम (ब.सा-1) और विरेन्द्र सिंह (ब.सा.-2) का परीक्षण कराया गया । तब उभयपक्ष को सुना जाकर विचारण न्यायालय द्वारा प्रश्नाधीन दोषमुक्ति का निर्णय पारित किया गया है जिसे इस अपील में चुनौती दी गई है ।

4. अपीलार्थी/राज्य की ओर से विद्वान अधिवक्ता का तर्क है कि पीड़िता (अ.सा.-3) ने अभियोजन मामले का समर्थन किया है तथा उसके कथन का समर्थन उसकी माता

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(अ.सा.-4) के कथन से भी होता है । ऐसी दशा में विचारण न्यायालय द्वारा उनके साक्ष्य पर विश्वास न करते हुए त्रुटिपूर्ण निष्कर्ष निकाला गया है जो विधि की दृष्टि में स्थि र रखे जाने योग्य नहीं है । अभियुक्त के विरूद्घ अभियोजन का मामला प्रमाणित रहा है । अतः प्रश्नाधीन दोषमुक्ति का निर्णय अपास्त करते हुए अपील स्वीकार की जाकर अभियुक्त को दोषसिद्ध कर दण्डि त किया जाए ।

5. उत्तरवादी/अभियुक्त के विद्वान अधिवक्ता द्वारा विचारण न्यायालय के प्रश्नाधीन निर्णय का समर्थन करते हुए यह तर्क प्रस्तुत किया गया है कि पीड़िता (अ.सा.-3) विश्वसनीय साक्षी नहीं है । उसके द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत घटना के लगभग एक वर्ष पश्चात् की गई है तथा विलंब का कोई स्पष्टीकरण प्रस्तुत नहीं किया गया है । पीड़िता के पति का भी परीक्षण नहीं कराया गया है । जिन साक्षियों को घटना की जानकारी पीड़िता द्वारा दिए जाने का उल्लेख किया गया है, उनमें से श्रीमती आभापति (अ.सा.-2) ने अभियोजन के मामले का समर्थन नहीं किया है तथा रामपति बाई का परीक्षण ही नहीं कराया गया है । चिकित्सीय साक्ष्य से भी पीड़िता के कथन की पुष्टि नहीं होती है । बचाव साक्षियों ने बताया है कि पीड़िता अपने पति के साथ जंगल में झाड़ियाँ काटने गई थी । उस समय जंगल में चौकीदार की हैसियत से उपस्थि त बचाव साक्षी वीरेन्द्र सिंह (ब.सा.-2) एवं अभियुक्त ने उन्हें जंगल में झाड़ियाँ काटने से मना किया था तथा उनकी टांगी छीन ली थी । इसी कारण पीड़िता ने अभियुक्त के विरुद्ध झूठी शिकायत दर्ज कराई । यह भी तर्क किया गया है कि पीड़िता झूठी शिकायत करने की आदी है । उसने स्वयं बचाव साक्षी फागूराम (ब.सा.-

1) के अतिरिक्त घुरसाय, पिंटू, जाना, बुद्धु एवं कन्हैया के विरुद्ध भी झूठे आरोप लगाकर उनके विरुद्ध पुलिस में शिकायत दर्ज कराई तथा उनसे पैसे लेकर राजीनामा कर लिया है । इस प्रकार विचारण न्यायालय द्वारा पीड़िता के कथनों पर विश्वास व्यक्त नहीं करते हुए जो

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दोषमुक्ति का निष्कर्ष अंकित गया है, वह पूर्णतः उचित है । अपीलार्थी/राज्य पक्ष द्वारा अपील में उठाए गए तर्क स्वीकार योग्य नहीं हैं । अतः अपील खारिज की जाए ।

6. उभयपक्ष का तर्क श्रवण किया गया और विचारण न्यायालय के अभिलेख का सूक्ष्मतापूर्वक परिशीलन किया गया ।

7. न्यायदृष्टांत Mallappa and other v. State of Karnataka, (2024) 3 SCC 544 में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा दोषमुक्ति के विरूद्घ प्रस्तुत अपील के निराकरण हेतु कुछ न्यायिक सिद्घांत प्रतिपादित किए गए हैं, जो कण्डि का-42 में निम्नानुसार हैः- “42. Our criminal jurisprudence is essentially based on the promise that no innocent shall be condemned as guilty. All the safeguards and the jurisprudential values of criminal law, are intended to prevent any failure of justice. The principles which come into play while deciding an appeal from acquittal could be summarised as:

(i) Appreciation of evidence is the core element of a criminal trial and such appreciation must be comprehensive inclusive of all evidence, oral or documentary;

(ii) Partial or selective appreciation of evidence may result in a miscarriage of justice and is in itself a ground of challenge;

(iii) If the court, after appreciation of evidence, finds that two views are possible, the one in favour of the accused shall ordinarily be followed;

(iv) If the view of the trial court is a legally plausible view, mere possibility of a contrary view shall not justify the reversal of acquittal;

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(v) If the appellate court is inclined to reverse the acquittal in appeal on a reappreciation of evidence, it must specifically address all the reasons given by the trial court for acquittal and must cover all the facts;

(vi) In a case of reversal from acquittal to conviction, the appellate court must demonstrate an illegality, perversity or error of law or fact in the decision of the trial court.”

8. न्यायदृष्टांत Santosh Prasad @ Santosh Kumar v. State of Bihar, (2020) 3 SCC 443 में उच्चतम न्यायालय द्वारा अवधारित किया गया है कि बलात्कार के अपराध में एकमात्र पीड़िता के कथन पर भी दोषसिद्धि की जा सकती है किन्तु यह तब होना चाहिए जब पीड़िता का बयान विश्वास पैदा करें तथा पूरी तरह से विश्वसनीय, बेदाग और उत्कृष्ट गुणवत्ता का प्रतीत हो, जो कि निम्नानुसार अवधारित किया गया है:- “5.4.3. In Krishan Kumar Malik v. State of Haryana (2011) 7 SCC 130 it is observed and held by this Court that no doubt, it is true that to hold an accused guilty for commission of an offence of rape, the solitary evidence of the prosecutrix is sufficient provided the same inspires confidence and appears to be absolutely trustworthy, unblemished and should be of sterling quality. 5.5 With the aforesaid decisions in mind, it is required to be considered, whether is it safe to convict the accused solely on the solitary evidence of the prosecutrix? Whether the evidence of the prosecutrix inspires confidence and appears to be absolutely trustworthy, unblemished and is of sterling quality?”

6. Having gone through and considered the deposition of the prosecutrix, we find that there are material contradictions. Not only there are material contradictions, but even the manner in which the alleged incident has taken place as per

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the version of the prosecutrix is not believable. In the examination-in-chief, the prosecutrix has stated that after jumping the fallen compound wall accused came inside and thereafter the accused committed rape. She has stated that she identified the accused from the light of the mobile. However, no mobile is recovered. Even nothing is on record that there was a broken compound wall. She has further stated that in the morning at 10 O’clock she went to the police station and gave oral complaint. However, according to the investigating officer a written complaint was given. It is also required to be noted that even the FIR is registered at 4:00 p.m. In her deposition, the prosecutrix has referred to the name of Shanti Devi, PW1 and others. However, Shanti Devi has not supported the case of the prosecution. Therefore, when we tested the version of PW5- prosecutrix, it is unfortunate that the said witness has failed to pass any of the tests of “sterling witness”. There is a variation in her version about giving the complaint. There is a delay in the FIR. The medical report does not support the case of the prosecution. FSL report also does not support the case of the prosecution. As admitted, there was an enmity/dispute between both the parties with respect to land. The manner in which the occurrence is stated to have occurred is not believable. Therefore, in the facts and circumstances of the case, we find that the solitary version of the prosecutrix-PW5 cannot be taken as a gospel truth at face value and in the absence of any other supporting evidence, there is no scope to sustain the conviction and sentence imposed on the appellant and accused is to be given the benefit of doubt.”

9. न्यायालय में दिए गए अपने कथन में अभियोक्त्री ने अभियोजन मामले का समर्थन किया है, किंतु न्यायदृष्टांत Santosh Prasad @ Santosh Kumar (पूर्वोक्त) के अनुसार ऐसी अभियोक्त्री का कथन संदेह से परे विश्वसनीय होना आवश्यक है ।

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10. संपूर्ण अभिलेख के परिशीलन से यह स्थि ति स्पष्ट होती है कि पीड़िता (अ.सा.-3) का व्यवहार गाँव में सामान्य नहीं रहा है । उसे विच्छि प्त अवस्था में होना बताया गया है । अतः न्यायालयीन बयान दर्ज किए जाने के पूर्व वह कथन करने में सक्षम है अथवा नहीं, इस संबंध में विचारण न्यायालय द्वारा उसकी क्षमता की जांच की गई है । स्वयं उसकी माता (अ.सा.-4) ने भी अपने कथन में कहा है कि पीड़िता पागल जैसी रहती थी तथा अभियुक्त उसका उपचार कर रहा था । माता (अ.सा.-4) ने प्रतिपरीक्षण में यह भी स्वीकार किया है कि उसने घटना को स्वयं नहीं देखा है तथा अभियुक्त एक बाल-बच्चे वाला व्यक्ति है । उसने यह भी कहा है कि जिस समय घटना होना बताया गया है, उस समय उसका दामाद अर्थात् पीड़िता का पति गाँव में ही रहता था । उसने यह भी कहा है कि पीड़िता बैराही जैसी है, जो किसी-किसी के विरुद्ध पुलिस में शिकायत कर देती है । उसने इस संबंध में जानकारी होने से इंकार किया है कि पीड़िता गाँव में जिन लोगों के विरुद्ध पुलिस में शिकायत करती है, उनसे पैसे लेकर समझौता कर लेती है । इस प्रकार, माता (अ.सा.-4) ने पीड़िता के इस कथन का स्पष्ट रूप से समर्थन नहीं किया है कि अभियुक्त ने उसकी जानकारी में पीड़िता के साथ जबरन संबंध स्थापित किया था ।

11. प्रथम सूचना पत्र के अनुसार, रामपति बाई का परीक्षण नहीं कराया गया है । दूसरी साक्षी श्रीमती आभापति (अ.सा.-2) ने अपने कथन में स्पष्ट रूप से कहा है कि पीड़िता ने उसे घटना के संबंध में कोई जानकारी नहीं दी थी । इस प्रकार, उक्त साक्षी अभियोजन के कथन का समर्थन नहीं करती है तथा वह पक्षद्रोही हो गई है ।

12. चिकित्सक स्नेहलता तिर्की (अ.सा.-1) ने पीड़िता का चिकित्सीय परीक्षण दिनांक 10/11/2009 को किया तथा उसकी परीक्षण प्रतिवेदन प्रदर्श पी-1 के रूप में प्रस्तुत की

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है । जिसके अनुसार पीड़िता संभोग की आदी थी । उसके गुप्तांग पर किसी प्रकार के चोट के निशान नहीं पाए गए तथा चिकित्सक द्वारा तत्कालीन संभोग के संबंध में कोई निश्चि त राय व्यक्त नहीं की गई है । इस प्रकार, पीड़िता के साथ घटना के समय संभोग किए जाने के संबंध में कोई चिकित्सीय साक्ष्य उपलब्ध नहीं है । चिकित्सक द्वारा तैयार की गई स्लाइड को रासायनिक परीक्षण हेतु भेजा गया था, जिसकी राज्य विधि विज्ञान प्रयोगशाला, रायपुर की जांच रिपोर्ट अभिलेख पर संलग्न है । उक्त रिपोर्ट के अनुसार स्लाइड में मानव शुक्राणु नहीं पाए गए हैं । अतः रासायनिक परीक्षण प्रतिवेदन से भी अभियोजन मामले की पुष्टि नहीं होती है ।

13. बचाव साक्षी के रूप में फागूराम (ब.सा.-1) एवं वीरेन्द्र सिंह (ब.सा.-2) ने इस आशय का कथन किया है कि पीड़िता अपने पति के साथ जंगल में टांगी से झाड़ियाँ काट रही थी । तब टांगी छीन लिए जाने के कारण उसने अभियुक्त के विरुद्ध झूठी शिकायत दर्ज कराई है । उन्होंने यह भी कहा है कि पीड़िता पूर्व में भी गाँव के अन्य लोगों के विरुद्ध झूठी शिकायत कर चुकी है तथा उनसे पैसे लेकर राजीनामा कर चुकी है । बचाव साक्षियों के इन कथनों का कुछ अंश तक समर्थन पीड़िता की माता (अ.सा.-4) के कथन से भी होता है ।

14. उपरोक्त समस्त परिस्थि तियों में अब पीड़िता (अ.सा.-3) के कथन की विश्वसनीयता का आंकलन किया जाए तो स्वयं पीड़िता ने अपने न्यायालयीन कथन में कहा है कि अभियुक्त लगभग 10 वर्ष पूर्व उसके घर में घुसकर उसका हाथ-बांह पकड़ा था तथा उसके साथ बेइज्जती की थी । इसके विपरीत, पुलिस में दर्ज शिकायत के अनुसार घटना लगभग 01 वर्ष पूर्व घटित होना तथा बलात्कार किया जाना बताया गया है, जबकि न्यायालयीन कथन में उसने घटना लगभग 10 वर्ष पूर्व की बताते हुए केवल छेड़छाड़ कर बेइज्जत किए जाने

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की बात कही है । इस प्रकार, उसके न्यायालयीन कथन एवं पुलिस में दर्ज शिकायत में घटना के समय तथा घटना की प्रकृति के संबंध में स्पष्ट विरोधाभास परिलक्षित होता है । जब पीड़िता को पक्षद्रोही घोषित कर सूचक प्रश्न किए गए, तब उसने स्वीकार किया कि अभियुक्त ने उसके साथ जबरदस्ती शारीरिक संबंध स्थापित किया था । किंतु प्रतिपरीक्षण में वह कहती है कि वह गाँव के मथुरा, फागु, पिंटू, घुरसाय, जाना चेरवा, प्रमोद, बुधुराम, कन्हैया एवं नरेश को जानती है और वे अभियुक्त का साथ दे रहे हैं, इसलिए उसने उनके विरुद्ध थाने में पूर्व में शिकायत दर्ज कराई है । इसी प्रकार, उसने आगे कहा है कि मथुरा नगेसिया ने उसके साथ बलात्कार नहीं किया था, किंतु उसके विरुद्ध इसलिए शिकायत दर्ज कराई थी क्योंकि वह अभियुक्त का साथ दे रहा था । उसने यह भी कहा है कि जाना चेरवा के लड़के के साथ झगड़ा होने के कारण उसके विरुद्ध भी शिकायत दर्ज कराई थी । इस प्रकार, बचाव साक्षियों द्वारा पीड़िता (अ.सा.-3) के संबंध में किए गए कथनों का कुछ हद तक समर्थन स्वयं पीड़िता के न्यायालयीन कथन से भी होता है कि वह पुलिस में शिकायत करने की आदी है । ऐसी स्थि ति में, पीड़िता के कथन में उत्पन्न गंभीर विरोधाभास तथा उसके कथन की किसी अन्य स्वतंत्र साक्ष्य से पुष्टि न होने की दशा में, उसके कथन पर संदेह से परे विश्वास किया जाना उचित नहीं रहा ।

15. इस प्रकार, उपरोक्त न्यायदृष्टांतों के प्रकाश में साक्ष्य विवेचना के फफलस्वरूप हम पाते हैं कि विचारण न्यायालय द्वारा जो दोषमुक्ति का निष्कर्ष अंकित किया गया है वह अभिलेख में उपलब्ध तथ्य और साक्ष्य के विपरीत या विरोधाभासी नहीं है तथा प्रश्नाधीन दोषमुक्ति के निर्णय में कोई अवैधता या अशुद्घता परिलक्षित नहीं होती । इसलिए उसमें हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं पायी जाती ।

16. अतः दोषमुक्ति के विरूद्घ प्रस्तुत यह अपील स्वीकार योग्य नहीं होने से खारिज की जाती है ।

17. निर्णय की प्रतिलिपि के साथ विचारण न्यायालय का अभिलेख शीघ्रतापूर्वक वापस प्रेषित हो । सही/- (संजय अग्रवाल) न्यायाधीश सही/- (संजय कुमार जायसवाल) न्यायाधीश पोमन

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