Debts Recovery Tribunals and Appellate Tribunals

MR VIJAY VEER SINGH vs CANARA BANK on 10 June 2025

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ऋण बसूली अधिकरण इलाहाबाद

(पीठासीन अधिकारी – माननीय श्री राम निवास पटेल)

आर. ए. नंबर – 06/2024

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1. 1. मेसर्स व्ही.एस. डेवलपर्स, भागीदारी फर्म द्वारा पार्टनर विजय वीर सिंह, कार्यालय पता 11, पुष्पांजलि विहार एक्सटेशन, सिकंदरा, आगरा, यू.पी. 282007

2. 2. विजय वीर सिंह पिता स्वर्गीय दाता राम, निवासी 11, पुष्पांजलि विहार एक्सटेशन, सिकंदरा, आगरा, यू.पी. 282007 ..... पुनरीक्षणकर्ता/आवेदकगण

विरुद्ध

1. 1. केनरा बैंक, बेलनगंज ब्रांच, द्वारा प्राधिकृत अधिकारी, आफिस एड्रेस : 8/390, भैरो बाजार, बेलनगंज, जिला आगरा, यू.पी. 282004

2. 2. महेश चंद पिता नाथी लाल, निवासी माण्ट दांगोली बंगु, महिवा 281202 ... उत्तरवादीगण —

आवेदक पक्ष के लिए श्री के. के. शर्मा अधिवक्ता, दिल्ली, स्थानीय अधिवक्ता श्री शिखर चंद्र अधिवक्ता के साथ।

उत्तरवादी बैंक के लिए श्री श्री मनीष मल्होत्रा अधिवक्ता।

नीलामी क्रेता पक्ष के लिए श्री आशीष कुमार श्रीवास्तव अधिवक्ता।

2आर. ए. नंबर-06/2024आदेश**(दिनांक 10.06.2025 को घोषित)**

1. 1. ऋणी फर्म मेसर्स व्ही.एस. डवलपर्स ने भागीदार विजय वीर सिंह के माध्यम से दिनांक 21.10.2024 को ऑनलाईन एवं दिनांक 23.10.2024 को भौतिक रूप से प्रस्तुत किये गये इस पुनर्विलोकन आवेदन (आर. ए.) के माध्यम से इस अधिकरण द्वारा सिक्योरिटाईजेशन एप्लीकेशन क्रमांक 17/2023 में घोषित निर्णय दिनांक 11.10.2024 का पुनर्विलोकन कर अपास्त किये जाने का अनुरोध किया है।

2. 2. आवेदक पक्ष द्वारा नियम 5-ए डी.आर.टी. (प्रोसीजर) रूल्स 1993 के प्रावधानानुसार प्रस्तुत किये गये इस पुनर्विलोकन आवेदन का संक्षेप इस प्रकार है कि ऋणी फर्म मेसर्स व्ही.एस. डवलपर्स एवं फर्म के भागीदार विजय वीर सिंह के द्वारा उत्तरवादी बैंक एवं नीलामी क्रेता महेश चन्द्र के विरुद्ध धारा 17(1) सरफेसी एक्ट 2002 के प्रावधानानुसार एस.ए. प्रस्तुत कर धारा 13(2) सरफेसी एक्ट 2002 के अंतर्गत प्रेषित मांग सूचना धारा 13(4) सरफेसी एक्ट 2002 के अंतर्गत की गई कार्यवाही साथ ही जिला मजिस्ट्रेट, द्वारा पारित आदेश सिक्योर्ड किडिटर बैंक द्वारा सम्पन्न की गई नीलामी कार्यवाही को अपास्त किये जाने की सहायता का अनुरोध किया गया जिस एस.ए. का निराकरण उभय पक्ष को सुन कर इस अधिकरण के पूर्वाधिकारी द्वारा घोषित निर्णय दिनांक 11.10.2024 के माध्यम से प्रस्तुत एस.ए. निरस्त की गई जिस निर्णय का पुनर्विलोकन कर अपास्त

किये जाने का अनुरोध कर समय सीमा के अंदर पुनर्विलोकन आवेदन प्रस्तुत किया गया है।

3. आवेदक पक्ष का अभिकथन है कि निर्णय की कंडिका 34 में नीलामी सूचना के विषय में व्याख्या की जाकर यह पाया गया है कि 13 दिवस के अंदर नीलामी कार्यवाही सम्पन्न कर ली गई है जिससे स्पष्ट है कि नियम 9(1) सरफेसी रूल्स 2002 का उल्लंघन हुआ है। साथ ही अभिकथन है कि मांग सूचना के विरुद्ध प्रस्तुत किये गये आपत्ति अभ्यावेदन दिनांक 03.10.2022 का समय सीमा के अंदर निराकरण किये जाने का असत्य कथन बैंक द्वारा किया गया जबकि अभ्यावेदन का निराकरण कर 15 दिवस के अंदर ऋणी पक्ष को सूचित नहीं किया गया है। किन्तु निर्णय की कंडिका 31 में इसके विषय में कोई निष्कर्ष नहीं है कि उत्तरवादी बैंक द्वारा प्रेषित पत्र दिनांक 11.10.2022 आवेदक पक्ष पर समय सीमा के अंदर तामील हुआ। साथ ही अभिकथन है कि मूल्यांकन प्रतिवेदन में सिक्योरिटी एसेट के सम्पूर्ण भाग का मूल्यांकन प्रकट नहीं होता एवं 05 वर्ष पूर्व किये गये मूल्यांकन की तुलना में वर्ष 2023 में कम मूल्यांकन किया गया जो यह दर्शाता है कि व्यवसायिक सम्पत्ति का उचित मूल्यांकन नहीं किया गया है। साथ ही अभिकथन है कि निर्णय के पृष्ठ क्रमांक 23 में सरफेसी एप्लीकेशन एलाउ किये जाने का उल्लेख किया गया तत्पश्चात स्वप्रेरणा से एलाउ शब्द को टंकण त्रुटि मान कर विलोपित किया गया जबकि अधिकरण को स्वप्रेरणा से पुनर्विलोकन की शक्तियां नहीं हैं।

4. आवेदक पक्ष का यह भी कथन है कि खुद अधिकरण द्वारा पारित आदेश दिनांक 26.02.2024 के माध्यम से ऋणी फर्म के पक्ष में स्थगन आदेश प्रदान किया गया जिसमें यह निष्कर्ष दिया गया कि उत्तरवादी बैंक ने नियम 9(1) सरफेसी रूल्स 2002 का पालन नहीं किया गया किन्तु अंतिम आदेश में पूर्णतः विपरीत निष्कर्ष लिखा गया। साथ ही अभिकथन है कि डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट द्वारा पारित आदेश दिनांक 15.05.2023 को आवेदक पक्ष ने संशोधन के माध्यम से चुनौती दिया किन्तु सम्पूर्ण निर्णय में आदेश की वैधता के विषय में कोई भी विवेचना नहीं की गई साथ ही अभिकथन किया गया कि नीलामी क्रेता ने 25 प्रतिशत बिड एमाउण्ट जमा करने के पश्चात शेष 75 प्रतिशत राशि जमा किये जाने हेतु समय सीमा विस्तारित किये जाने का कोई आवेदन प्रस्तुत नहीं किया गया, किन्तु इस बिन्दु पर भी कोई निष्कर्ष नहीं लिखा गया।

5. साथ ही यह भी अभिकथन है कि ऋणी पक्ष ने ऋण की सुरक्षा में मात्र भू-बंधक किया, भूमि के ऊपर स्थित संरचना बंधक नहीं थी एवं साम्य बंधक से संबंधित अनुबंध का पंजीयन भी नहीं था, कोई अभिलेख भी प्रस्तुत नहीं किये गये एवं बंधक भूमि पर स्थित दुकाने फरवरी 2014 में निर्मित की जा चुकी थी। सेल सर्टिफिकेट से भी स्थिति स्पष्ट है। इसके अतिरिक्त अभिकथन है कि बैंक अधिकारी कूट रचना के दोषी पाये गये हैं जिनके विरुद्ध अभियोग पत्र प्रस्तुत हुआ है। इन सभी आधारों पर पुनरावलोकन आवेदन स्वीकारने का अनुरोध किया गया है।

6. उत्तरवादी पक्ष द्वारा पुनरावलोकन आवेदन का लिखित जवाब प्रस्तुत नहीं किया गया है। मौखिक एवं लिखित तर्क के माध्यम से प्रस्तुत पुनरीक्षण की ग्राह्यता पर आपत्ति दर्ज कराई गई है।

7. प्रस्तुत किये गये लिखित तर्क के माध्यम से उत्तरवादी बैंक का प्रतिवाद है कि उभय पक्ष को सुनवाई का अवसर देकर तथ्यों का विस्तार पूर्वक विवेचन करते हुए निर्णय दिनांक 11.10.2024 पारित किया गया है जिसमें प्रत्यक्षतः कोई त्रुटि नहीं है। किन्तु आवेदक पक्ष प्रस्तुत पुनरावलोकन आवेदन के माध्यम से पूर्व में निर्णीत किये जा चुके प्रश्नों के विषय में पुनः तर्क प्रस्तुत करना चाहता है एवं पुनरावलोकन की आड़ में केस को रि-ओपन कराना चाहता है अर्थात प्रकरण में पुनः सुनवाई चाहता है जबकि आदेश 47 नियम 1 सी.पी.सी. के प्रावधानानुसार पुनरावलोकन की सीमा सीमित है।

8. उत्तरवादी पक्ष का तर्क है कि माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा सुस्थापित विधि के अनुसार जब तक पारित निर्णय अथवा आदेश में प्रथम दृष्ट्या त्रुटि विद्यमान न हो तब तक पुनरावलोकन शक्तियों का प्रयोग नहीं किया जा सकता।

9. उत्तरवादी नीलामी क्रेता पक्ष ने भी प्रस्तुत किये गये तर्क के माध्यम से उत्तरवादी बैंक के तर्क के अनुरूप प्रतिवाद किया है कि अधिकरण द्वारा पारित आदेश दिनांक 11.10.2024 में कोई प्रत्यक्षदर्शी त्रुटि नहीं है एवं नीलामी क्रेता ने समय सीमा के अंदर विड एमाउण्ट जमा किया है तब अंतिम आदेश के पुनरावलोकन का कोई आधार नहीं है।

10. उभय पक्ष के मौखिक एवं लिखित तर्क के प्रकाश में एक मात्र विचारणीय प्रश्न है कि :- "क्या प्रस्तुत पुनरावलोकन आवेदन, पुनरावलोकन शक्तियों के अधीन होकर स्वीकारने योग्य है" ?

11. आवेदक पक्ष द्वारा प्रस्तुत किये गये पुनरावलोकन आवेदन एवं तर्क के माध्यम से मुख्य रूप से इस अधिकरण द्वारा निर्णीत एस.ए. 17/2023 में घोषित निर्णय दिनांक 11.10.2024 की वैधता को चुनौती देते हुए तर्क रखा गया है कि निर्णय की कंडिका 34 की विवेचना के दौरान माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा मैथ्यु वर्गिस विरुद्ध एम. अमृता कुमार एवं अन्य (2014) 5 एस.सी.सी. 610 में नीलामी सूचना की तामीली के विषय में प्रतिपादित दिशा निर्देश को अनदेखा किया गया है। साथ ही आपत्ति ली गई है कि उत्तरवादी बैंक ने लौन डाकूमेंट्स प्रस्तुत नहीं किये किन्तु अधिकरण द्वारा लौन डाकूमेंट्स आहुत किये बिना निर्णय पारित कर दिया गया। साथ ही आपत्ति ली गई है कि 09 वर्ष पुराने मूल्यांकन प्रतिवेदन के आधार पर आदेश पारित किया गया है।

12. आवेदक पक्ष का यह भी तर्क रहा है कि आवेदक पक्ष द्वारा प्राप्त मूल्यांकन प्रतिवेदन के अनुसार विक्रय की गई सम्पत्ति 10 करोड़ से अधिक मूल्य की है किन्तु अतिन्यून मूल्य पर सम्पत्ति विक्रय कर दी गई। पेपर पब्लिकेशन के आधार पर नीलामी सूचना की तामीली विधि सम्मत मानते हुए निर्णय पारित किया

गया। इस तरह से पारित निर्णय में प्रथम दृष्ट्या दोष है।

13. उत्तरवादी पक्ष द्वारा प्रस्तुत किये गये मौखिक एवं लिखित तर्क के माध्यम से पुनरावलोकन आवेदन का विधिक आधारों पर प्रतिवाद किया गया है।

14. यह सुस्थापित विधि है कि पुनरावलोकन की शक्तियां सीमित होती है। माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा डीजल लोकशेड एण्ड सदरन रेल्वे हाउसिंग बिल्डिंग को-आपरेटिव सोसायटी लिमि. विशाखापट्टम एवं अन्य विरुद्ध अदिली अपला स्वामी (2015)2 एस.सी.सी. 390 में माननीय 03 न्यायमूर्तियों के माध्यम से यह विधि सुस्थापित की गई है कि न्यायालय को पुनरावलोकन की सीमित शक्तियां आदेश 47 नियम 1 सी.पी.सी. के प्रावधानानुसार प्राप्त है। इस दृष्टिकोण से इस अधिकरण को इस तथ्य का परीक्षण करना है कि क्या आवेदक पक्ष द्वारा प्रस्तुत पुनरावलोकन आवेदन सीमित शक्तियों के अधीन स्वीकारने योग्य है।

15. यह भी सुस्थापित विधि है कि पुनरावलोकन आवेदन प्रस्तुत कर आवेदक पक्ष को यह प्रकट करना होता है कि पारित आदेश अथवा घोषित निर्णय में ऐसी प्रत्यक्षदर्शी त्रुटि विद्यमान है कि तथ्यों की विवेचना किये बिना वह त्रुटि प्रत्यक्षतः प्रकट होती हो अन्यथा दोष पूर्ण निर्णय भी पुनरावलोकन शक्तियों के अधीन नहीं बदला जा सकता। इस सन्दर्भ में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा डॉ० सुब्रामणियम स्वामी विरुद्ध स्टेट ऑफ तमिलनाडु एवं अन्य (2014) 5 एस.सी.सी. 75 में प्रतिपादित अभिमत अनुकरणीय है। माननीय उच्चतम

न्यायालय का अभिमत है कि यदि आक्षेपित आदेश में प्रत्यक्षदर्शी त्रुटि नहीं है तब त्रुटि पूर्ण निर्णय भी पुनरावलोकन का आधार नहीं हो सकता एवं निर्णय की अंतिमता को व्यवधानित नहीं किया जा सकता।

16. इस दृष्टिकोण से जब अधिकरण पुनरावलोकनकर्ता पक्ष की ओर से उठाई गई आपत्तियों के सन्दर्भ में एस.ए. 17/2023 में घोषित दिनांक 11.10.2024 का अवलोकन करता है तो पाया जाता है कि निर्णय की कंडिका 28 से 36 के मध्य अधिकरण के पूर्वाधिकारी द्वारा अभिलेख में उपलब्ध सामग्री का विस्तृत विवेचन करते हुए विस्तारपूर्वक निर्णय लिखा है अर्थात विधिक भाषा में "स्पीकिंग जजमेंट" घोषित किया गया है।

17. निर्णय की कंडिका 31 में मांग सूचना दिनांक 04.08.2022 की तामीली का निष्कर्ष दिया गया है। कंडिका 32 में अधिपत्य सूचना दिनांक 04.11.2022 की तामीली की व्याख्या की गई है निर्णय की कंडिका 33 में उत्तरवादी बैंक द्वारा प्राप्त किये गये मूल्यांकन प्रतिवेदन दिनांक 01.07.2023 के आधार पर आरक्षित मूल्य निर्धारित किये जाने का निष्कर्ष दिया गया है। कंडिका 34 में नीलामी सूचना दिनांक 11.10.2023 की तामीली प्रकाशन के आधार पर विधिक समयавधि पूर्व नीलामी सूचना की तामीली का निष्कर्ष दिया गया है। कंडिका 35 में दिनांक 30.10.2023 को नीलामी कार्यवाही विधिक रूप से सम्पन्न होने एवं नीलामी केता द्वारा समय सीमा के अंदर सम्पूर्ण नीलामी राशि जमा किये जाने का निष्कर्ष दिया गया है अर्थात पुनरावलोकन आवेदन के

माध्यम से आवेदक पक्ष का जो यह तर्क एवं आपत्ति है कि अधिकरण के पीठासीन अधिकारी ने महत्वपूर्ण विधिक व्यवस्थाओं एवं तथ्यों को अनदेखा करते हुए एस. अपीलॉट द्वारा प्रस्तुत एस.ए. को अप्रमाणित मान कर निरस्त करने का निष्कर्ष लिखा है, यह तर्क किसी भी दृष्टिकोण से स्वीकारने योग्य नहीं है।

18. तो जब पुनरावलोकन शक्तियां सीमित होती है एवं इस अधिकरण के पूर्वाधिकारी द्वारा एस.ए. 17/2023 में घोषित निर्णय दिनांक 11.10.2024 अभिलेख में उपलब्ध सामग्री की विस्तृत व्याख्या करते हुए न्यायिक विवेकानुसार निष्कर्ष लिखा गया है तो भले ही आवेदक पक्ष के दृष्टिकोण से घोषित निर्णय त्रुटिपूर्ण हो, तब भी यह अधिकरण को अपने ही निर्णय की व्याख्या अपीलेट कोर्ट की तरह समग्रता के साथ करने का हक पुनरावलोकन आवेदन के माध्यम से नहीं है एवं इस अधिकरण को प्रत्यक्षदर्शी त्रुटि के अभाव में अपने द्वारा घोषित निर्णय को पुनरावलोकन शक्तियों का प्रयोग कर पूर्व में लिखे गये निष्कर्ष पर हस्तक्षेप करने की शक्ति नहीं है।

19. माननीय उच्चतम न्यायालय के द्वारा अशरफी देवी द्वारा लीगल रिप्रेजेंटेटिव विरुद्ध स्टेट ऑफ यू.पी. एवं अन्य (2019) 5 एस.सी.सी. 86 के मामले में अभिमत दिया गया है कि पुनरावलोकन की अधिकारिता के अंतर्गत मूल निर्णय में लिखे गये निष्कर्ष का नये सिरे से परीक्षण नहीं किया जा सकता। साथ ही अभिमत दिया गया है कि प्रत्येक तथ्यात्मक अथवा विधिक त्रुटि पुनरावलोकन का आधार नहीं हो सकती, भले ही ऐसी

त्रुटि अपील की विषय वस्तु बनती हो। साथ ही माननीय उच्चतम न्यायालय के माननीय 03 न्यायमूर्तियों के द्वारा शांति कांडक्टर्स प्राईवेट लिमिटेड विरुद्ध स्टेट ऑफ असम इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड एवं अन्य (2020) 2 एस.सी.सी. 677 में प्रतिपादित अभिमत के अनुसार जब प्रस्तावित त्रुटि स्वतः प्रत्यक्ष न हो बल्कि विवेचना के माध्यम से प्रकट किये जाना प्रस्तावित हो तब ऐसी त्रुटि प्रत्यक्ष त्रुटि नहीं कही जा सकती एवं न्यायालय को इस परिस्थिति में पुनरावलोकन के अधीन त्रुटि दूर करने की अधिकारिता नहीं बनती।

20. तो जब इस अधिकरण के पूर्व पीठासीन अधिकारी ने एस.ए. 17/2023 में दिनांक 11.10.2024 को निर्णय घोषित किये जाने हेतु, अभिलेख में उपलब्ध तथ्यों एवं विधिक व्यवस्थाओं की विधिक विवेचना करते हुए ऋणी पक्ष द्वारा प्रस्तुत एस.ए. को अप्रमाणित मान कर निरस्त किये जाने का निष्कर्ष लिखा है तो यह निष्कर्ष इस प्रकृति का नहीं है कि यह अधिकरण पुनरावलोकन की सीमित शक्तियों के अधीन अपने ही द्वारा लिखे गये अंतिम निष्कर्ष को पुनः नये सिर से आवेदक पक्ष द्वारा प्रस्तावित आपत्तियों के अधीन विवेचना करे एवं पुनः निष्कर्ष अभिलिखित करे अर्थात आवेदक पक्ष द्वारा प्रस्तुत पुनरावलोकन आवेदन ओदश 47 नियम 1 सी.पी.सी. के अंतर्गत न्यायालय अथवा अधिकरण को प्राप्त पुनरावलोकन शक्ति के अनुरूप नहीं है एवं इस अधिकरण द्वारा पारित अंतिम आदेश दिनांक 11.10.2024 में ऐसी कोई प्रत्यक्षदर्शी त्रुटि नहीं है जिसके आधार पर यह अधिकरण एस.ए. 17/2023 में घोषित निर्णय दिनांक

11.10.2024 का पुनरावलोकन कर अभिलिखित निष्कर्ष पर हस्ताक्षेप कर सकें।

21. फलस्वरूप आवेदक पक्ष द्वारा प्रस्तुत पुनरावलोकन आवेदन विधिक प्रावधानों से परे अर्थात् आधारहीन पाते हुए निरस्त किया जाता है।

22. चूंकि आवेदक पक्ष द्वारा प्रस्तुत पुनरावलोकन आवेदन आधारहीन निर्धारित कर, निरस्त किया जा चुका है। अतः दिनांक 05.11.2024 को पारित स्थगन आदेश तत्काल प्रभाव से समाप्त किया जाता है।

23. आदेश की प्रति एस.ए. 17/2023 में संलग्न की जाये।

24. उभय पक्ष अपना अपना व्यय वहन करेंगे।

आदेश खुले न्यायालय में आज दिनांक 10.06.2025 को हस्ताक्षरित, दिनांक कर घोषित किया गया।

जबलपुर,

दिनांक 10.06.2025

10.06.25

(राम निवास पटेल)

पीठासीन अधिकारी

डी.आर.टी.म.प्र.एवं छत्तीसगढ़

(अतिरिक्त प्रभार डी.आर.टी.इलाहाबाद)

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